बेंगलूरु/दक्षिण भारत। यहां शांतिनगर स्थित लुणावत जैन स्थानक भवन में श्री जयधुरंधरमुनिजी ने गुरुवार को अपने उद्बोधन में कहा कि धर्म ही सच्चा शरणभूत होता है। उन्होंने कहा कि संकट के समय व्यक्ति परिवार, मित्र, सगे-संबंधी की शरण लेता है, लेकिन वे वास्तविक शरण नहीं दे सकते। मुनिश्री ने कहा कि जो स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकते, वे भला दूसरों की रक्षा कैसे कर सकते हैं? जयधुरंधरजी ने कहा कि जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। जिसने धर्म का आलंबन लिया, उसका बे़डा पार हो जाता है। धर्म को जीव के लिए रक्षाकवच बताते हुए मुनिश्री ने यह भी कहा कि किया गया धर्माराधन कभी खाली नहीं जाता है। धर्म का फल अवश्य मिलता है और धर्म की शरण में जो चले जाता है उसके दुख-दारिद्र्य, रोग-शोक, ताप-संताप सब दूर हो जाते हैं। संचालन संघ के मंत्री छगनमल लुणावत ने किया।

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