जीवदया के पर्याय मुनिश्री रूपचंदजी ‘रजत’, मानवसेवा के लिए कर गए ये महान कार्य

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— आचार्यश्री हस्ती के शिष्य श्री ज्ञानमुनिजी —

सन्दर्भ: श्रद्धांजलि (निधन 18 अगस्त, 2018)

लोकमान्य संत, शेरे-राजस्थान, वरिष्ठ प्रवर्तक श्री रूपचन्द्रजी महाराज ‘रजत’ का जन्म राजस्थान के पाली जिलान्तर्गत नाडोल में विक्रम संवत् 1985 में सावन शुक्ल दशमी को हुआ। उनका बचपन का नाम रूपपुरी था। माता मोतीबाई और पिता ‘गृहस्थयोगी’ भेरूपुरी गोस्वामी के घर में जन्मे रूपपुरी के दादा ठाकुर देवीसिंह चौहान सात सुरों की वीणा के साधक थे। अध्यात्म और संस्कृति के वातावरण में उनका बचपन बीता। बचपन से ही उनकी अनेक विशेषताएँ प्रकट होने लग गई थीं। कुछ विशेषताएँ यहाँ अंकित की जा रही हैं।

उत्तराधिकार ठुकराया
रूपपुरी को बचपन से ही अध्यात्म की प्यास थी। अपनी प्यास बुझाने के लिए पहले वे आरणेश्वर महादेव के मठाधीश स्वामी शंकर भारती के नजदीक रहे। वहाँ उन्हें ऐश्वर्य और अध्यात्म का दोहरा सुख मिला। इस बीच शंकर भारती ने संसार को अलविदा कह दिया। शंकर भारती के स्वर्गवास के बाद रूपपुरी को आरणेश्वर शैवमठ के उत्तराधिकारी के रूप में स्थापित करने के प्रयास प्रारंभ हुए। किंतु रुपपुरी ने कहा- ‘मैं तो यहाँ साधना के लिए आया था, उत्तराधिकार के लिए नहीं। मैं आश्रम छो़डकर चला जाना चाहता हूँ।’ रूपपुरी फिर अपने घर लौट आये। उनके जीवन की यह घटना उनके त्याग का प्रेरणादायक उदाहरण है।

फक्कड़ संत
रूपपुरी की आत्मा की प्यास गुरुदेव मुनिश्री मोतीलालजी और मरुधरकेसरी श्री मिश्रीमलजी महाराज के सान्निध्य में शांत हुई। उन्होंने जैन आर्हती दीक्षा ले ली और वे मुनि रूपचन्द्रजी ‘रजत’ बन गये। मरुधर केसरी जी महाराज का मंगल आशीर्वाद और स्वयं की तपसाधना से मुनिश्री रजत के जीवन में अनेक विलक्षण क्षमताएँ और सिद्धियाँ विकसित होती गईं। समाज में एक फक्क़ड और स्पष्टवादी संत के रूप में उनकी पहचान बनी। उन्होंने अपनी फक्क़डता और साधुता को परोपकार में लगा दिया।

गरीबों के मसीहा
श्रमण सूर्य मरुधरकेसरी मुनिश्री मिश्रीमलजी महाराज को गरीबों का मसीहा कहा जाता है। मुनिश्री रजत भी गरीबों के मसीहा के रूप में जाने जाते हैं। आस लेकर उनके पास आया कोई भी व्यक्ति कभी रिक्त नहीं लौटा। किसी का भला करने के लिए उनका एक संकेत ही काफी होता है। उनकी पावन प्रेरणा से अनगिनत दुखियारों के जीवन में सुख का संचार हुआ है।

मानवसेवा
शिक्षा, चिकित्सा, स्वास्थ्य, अन्नदान, वस्त्रदान इत्यादि मानवसेवा की अनेक योजनाएँ अनेक रूपों में मुनिश्री रजत की प्रेरणा से संचालित हो रही हैं। करुणा उनके रोम-रोम में बसी है। मरूधरकेसरी जी महाराज की प्रेरणा से संचालित योजनाओं को स्थायित्व प्रदान करने में भी इनकी प्रेरणाएँ रही हैं। किसी एक ही सन्त की प्रेरणा से इतने सेवाकार्यों का सुचारू रूप में संचालन सचमुच समाज और देश की बहुत ब़डी सेवा है।

जीवदया
मुनिश्री रजत की प्रेरणा से राजस्थान और अन्य राज्यों में अनेक स्थानों पर सैंक़डों गौशालाएँ अच्छी तरह से चल रही हैं। बूच़डखाने जाते गौवंश, बकरों और भैंसों को बचाने में भी इनकी प्रेरणा रही है और अनेक जीवों को अभयदान मिला है। अकाल के समय में भी इनकी प्रेरणा से अनेक मूक प्राणियों की रक्षा हुई है। कई स्थानों पर पशुबलियाँ रुकवाने में भी इनकी प्रबल प्रेरणा रही है। जीवदया के मामले में इन्होंने जैन दिवाकर मुनिश्री चौथमलजी और मरूधरकेसरीजी के अभियान को आगे ब़ढाने में उल्लेखनीय योगदान किया है।

सर्वमान्य विभूति
मुनि श्री रूपचन्द्रजी ‘लोकमान्य संत’ के रूप में तो प्रसिद्ध हैं ही; साथ ही वे समाज में भी सर्वमान्य सन्त माने जाते हैं। जिन्होंने भी रूपचन्द्रजी महाराज की पावन सन्निधि पाई है, उनका अनुभव है कि वे वास्तव में लोकमान्य, सर्वमान्य संत हैं। देशभर में जैन और जैनेतर सभी समुदायों और वर्गों के व्यक्ति उनके प्रति श्रद्धा रखते हैं। जैन दिवाकर मुनिश्री चौथमलजी के बाद ऐसी व्यापक लोकश्रद्धा बहुत कम जैन संतों ने पाई। श्रमण संघ में उनकी बात कोई नहीं टालता था। वे श्रमणसंघ की आशा और विश्वास के प्रतीक रहे। कई बार उन्होंने संघीय पद निर्धारण में अपने निर्णायक कदम से ‘किंगमेकर’ की भूमिका का निर्वहन भी किया है। उनका किया हुआ हमेशा फला है।

वचनसिद्ध
मुनि श्री रजत एक वचनसिद्ध संत थे। उनका सहज साधारण कहा गया कथन भी सौ टका सही सिद्ध हो जाता था। वे सबका हित सोचते थे और सबकी कुशलता चाहते थे। अनेक भक्त उनका आशीर्वाद पाकर सुखी-सम्पन्न और उदार बने हैं। एकता, संगठन, लोक कल्याण, जनभाषा युक्त जीवंत सम्पर्क इत्यादि विशेषताएँ उनके प्रभावशाली संतत्व का गौरव ब़़ढाती हैं। ऐसे अनेक सद्गुणों के धारी मुनिश्री रजत की स्मरण शक्ति भी अद्भुत थी। वे पुरानी प्रेरणादायी घटनाओं और प्रसंगों के जीवन्त कोश थे। जीवन के नब्बे वसंत पार करने के बावजूद अभी भी उनका आत्मबल गजब का था। वे बिना किसी भेेदभाव के सबको खुशियां देते थे और खुशिया बांटते थे।

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