घरवालों का दिल दुखा कर किया गया धर्म-कर्म है व्यर्थ

राष्ट्रसंतों का रानीबेन्नूर आगमन पर हुआ जोरदार स्वागत

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रानीबेन्नूर। ’’राष्ट्रसंत ललितप्रभसागरजी ने कहा कि हमसे सामायिक-प्रतिक्रमण, पूजा-पाठ हो तो अच्छी बात है, पर हम ऐसा कोई काम न करें कि जिससे हमारे घर वालों की आंखांे में आंसू आएं। अगर कोई एक तरफ घर वालों का दिल दुखाता है और दूसरी तरफ धर्म-कर्म करता है तो उसका सारा धर्म-कर्म व्यर्थ है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति मंदिर अथवा स्थानक में आधा या एक घंटा रहता है और घर में तेइस घंटे इसलिए धर्म की शुरुआत मंदिर या स्थानक से नहीं, घर से ही करनी चाहिए।’’ संतश्री ललितप्रभजी मंगलवार को स्थानीय जैन श्वेताम्बर संघ के तत्वावधान में यहां स्टेशन रोड स्थित मर्चेन्ट एसोसिएशन में आयोजित प्रवचन समारोह में ब़डी संख्या में मौजूद श्रद्धालुआंे को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि व्यक्ति घर में रामायण लाए और महाभारत हटाए। महाभारत स्वार्थ का परिणाम है और रामायण त्याग का। जहां स्वार्थ आएगा वहां रिश्तों में खटास आएगी और जहां प्रेम होगा वहां रिश्तों में मिठास ब़ढेगी। उन्होंने कहा कि स्वर्ग-नरक किसी आसमान या पाताल में नहीं, घर में ही है। जिस घर में सास-बहू, देराणी-जेठाणी, भाई-भाई हिल-मिल कर रहते हैं और सुख-दुख में सहभागी बनते हैं वह घर स्वर्ग है और जिस घर में पांच भाइयों के होते हुए बू़ढे मां-बाप को अपने हाथों से खाना बनाना प़डता है वह घर नरक है। संतश्री ने उपस्थित महिला समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि वे सब कुछ पीहर से लेकर आईं होंगीं, लेकिन सुहाग तो सास-श्वसुर ने ही दिया है। आप कुछ न करें, बस, जितने साल का आपको पति मिला है, आप उतने साल तक सास-श्वसुर की सेवा करने और उन्हें निभाने का ब़डप्पन अवश्य दिखाएं। इस मौके पर ललितप्रभजी ने उपस्थित सासुओं से भी कहा कि आपकी बहू आपके बेटे से भी ब़ढकर है जिसने आपके बेटे के घर को बसाने के लिए अपने मां-बाप छो़डे, जाति और पहनावे को बदला। उन्होंने कहा कि उसने तो इतना त्याग किया, पर क्या आप उसे निभाने का थो़डा-सा भी ब़डप्पन नहीं दिखा सकते? जिस तरह आपने अपनी बेटी की गलतियों को छिपाया, वैसे ही बहू की गलतियों को भी छिपाएं, उन्हें उघा़डने का पाप कदापि नहीं करना चाहिए। संतश्री ने कहा कि पहले मकान छोटे होते थे, पर दिल ब़डे, सो पांच भाई भी साथ रह लेते थे। आज मकान तो खूब ब़डे बन रहे हैं, पर लोगों के दिल छोटे हो गए हैं। परिणाम दो भाई भी साथ रह नहीं पा रहे हैं। मंदिर बनाना हिन्दुओं का, मस्जिद बनाना मुसलमानों का, गुरुद्वारा बनाना सिखों का और चर्च बनाना ईसाइयों का धर्म है, पर अपने भाई को ऊपर उठाना यह मानवता का धर्म है। घर से सेवा की शुरुआत करने की सीख देते हुए संतश्री ने कहा कि लॉयंस क्लब, रोटरी क्लब, महावीर इंटरनेशनल या ऐसी किसी सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक संस्था का सदस्य बनकर मानवता की सेवा करना सरल है, मगर घर का सदस्य बनकर मां-बाप की सेवा करना मुश्किल है। उन्होंने कहा कि या तो दुनिया में किसी की दुआएं काम नहीं करती और करती है तो सबसे पहले मां-बाप की ही दुआएं काम करती हैं। इससे पूर्व संतश्री ललितप्रभजी, संतश्री चन्द्रप्रभजी एवं डॉ. शांतिप्रियसागरजी के शहर में आगमन पर संघ के पदाधिकारियों, जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं एवं सर्वसमाज के श्रद्धालुओं द्वारा स्वागत किया गया। प्रवचन कार्यक्रम में शिव्वगोग्गा, दावणगेरे, अरसीकेरे संघ के साथ ट्रस्ट के अध्यक्ष अशोक जैन, उपाध्यक्ष अरविंद जैन, अमृतलाल जैन, सोहनलाल जैन, डायालाल जैन, रतनचंद जैन, वनेचन्द्र जैन, डुंगरमल जैन, किशोर जैन, विनोद जैन तथा भभूतचन्द्र जैन आदि भी उपस्थित थे।

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