kuldeep singh chandpuri
kuldeep singh chandpuri

नई दिल्ली/दक्षिण भारत। भारत और पाकिस्तान के बीच 1971 का युद्ध कई मोर्चों पर लड़ा गया। इनमें ‘लोंगेवाला’ की लड़ाई भारतीय सेना की वीरता, शौर्य और शक्ति की अद्भुत कहानी है। इस लड़ाई के नायक थे कुलदीप सिंह चांदपुरी, जो उस समय सेना की पंजाब रेजिमेंट में मेजर के पद पर सेवारत थे। लोंगेवाला की लड़ाई में उन्होंने अपने साथी जवानों का हौसला बढ़ाया और विशाल तादाद में आई दुश्मन की फौज का मुकाबला किया। यही नहीं, चांदपुरी के रणनीतिक कौशल और जवानों के जोरदार जवाब से दुश्मन के पांव उखड़ने लगे।

मॉन्टगुमरी (अब पाकिस्तान) में 22 नवंबर, 1940 को जन्मे कुलदीप सिंह का बचपन से ही सेना की ओर रुझान था। वे एनसीसी में भर्ती हुए थे। उनके दो चाचा वायुसेना में थे। साल 1962 में कुलदीप सिंह सेना में भर्ती हुए। उन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध में भाग लिया और वीरता का प्रदर्शन किया। सत्तर का दशक आते-आते एक बार फिर पाकिस्तान का जंगी जुनून सिर उठाने लगा था।

3 दिसंबर, 1971 को भारत के कई ठिकानों पर पाकिस्तानी वायुसेना के हमलों के साथ ही दोनों देशों में युद्ध शुरू हो गया। उस समय कुलदीप सिंह चांदपुरी पंजाब रेजिमेंट की 23वीं बटालियन का नेतृत्व करने के लिए राजस्थान के जैसलमेर स्थित लोंगेवाला पोस्ट पर तैनात थे। यह रेगिस्तानी इलाका सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां पास में ही तनोट माता का प्राचीन मंदिर है। पाकिस्तानी फौज अपने टैंकों की बदौलत इस मंदिर को नुकसान पहुंचाना चाहती थी। साथ ही इस इलाके पर कब्जा कर भारत पर दबाव बढ़ना चाहती थी।

चूंकि उस समय पूर्वी पाकिस्तान (मौजूदा बांग्लादेश) में भी युद्ध चल रहा था, इसलिए बड़ी तादाद में हमारी सेना के जवान वहां लड़ रहे थे। ऐसे में पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान ने मौका देखकर हमला बोल दिया। जब पाकिस्तानी फौज अपने टैंकों और करीब 2,000-3,000 जवानों के साथ लोंगेवाला के नजदीक पहुंची तो वहां उनका सामना मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी से हुआ। उन्होंने पाकिस्तानियों को ललकारा और मुकाबला किया।

लोंगेवाला में जबरदस्त भिड़ंत हुई। चांदपुरी ने अपने रणकौशल से पाकिस्तान को सरहद पार नहीं करने दी। उधर, सुबह की पहली किरण के साथ ही भारतीय वायुसेना ने भी यहां धावा बोला और पाकिस्तानी फौजी धराशायी होने लगे। कई पाकिस्तानी तो अपने टैंक छोड़कर भाग गए। उस युद्ध में पाक बुरी तरह हारा और उसके दो टुकड़े हो गए। चांदपुरी के अद्भुत पराक्रम को पूरे देश ने सराहा। उन्हें महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। बाद में वे ब्रिगेडियर के पद से सेवानिवृत्त हुए।

लोंगेवाला में आज भी उस जंग की यादों को सहेजकर रखा गया है। दुश्मन ने तनोट माता के मंदिर पर जो गोले दागे, वे नाकाम रहे। यहां पाकिस्तान का एक टैंक भी रखा है, जिसे उसके फौजी छोड़कर भाग छुटे थे। ब्रिगेडियर चांदपुरी के जीवन पर 1997 में बॉलीवुड फिल्म ‘बॉर्डर’ रिलीज हुई थी। उसमें सनी देओल ने उनका किरदार निभाया था। देश के इस महावीर ने 77 साल की उम्र में 17 नवंबर, 2018 को मोहाली में आखिरी सांस ली। उनकी बहादुरी के किस्से किताबों से लेकर इंटरनेट तक खूब पढ़े जाते हैं।

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