बेंगलूरु/दक्षिण भारतयहां नगरथपेट स्थित अजितनाथ जैन संघ के तत्वावधान में सोमवार को आचार्यश्री रत्नसेनसूरीश्वरजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि जिस प्रकार शरीर में रही एक छोटी-सी भी कैंसर की गांठ अंत मंे मौत का कारण बनती है, उसी प्रकार हृदय में रही छोटी सी वैर की गांठ जीवात्मा को भवोभव तक अनेक प्रकार से मार खिलाती है। वैर की गांठ को कैंसर की गांठ से भयंकर बताते हुए आचार्यश्री ने कहा कि क्रोध हमारे मन में रही प्रीति को नाश करता है। यदि हृदय में मैत्री का भाव हो तो क्रोध पैदा ही नहीं होगा, कदाचित पैदा हो भी जाए तो मैत्री का भाव उसे नाश कर देता है। आचार्यश्री रत्नसेनजी ने कहा कि जब हमें हमारा सुकृत ब़डा लगता है तो हमें अभिमान आता है, लेकिन जब मन में प्रमोदभाव स्थापित होता है तो अपना किया हुआ सुकृत हमें छोटा लगने लगता है और मान का नाश हो जाता है। आचार्यश्री ने माया कषाय को नाश करने, सभी दुखी जीवों पर करुणा का भाव स्थापित करने की सीख देते हुए कहा कि जिसके मन मंे करुणा का स्रोत बहता है वह किसी को भी कष्ट नहीं पहुंचा सकता है। उन्होंने कहा कि करुणाभाव से माया का नाश स्वतः हो जाता है।

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