दक्षिण भारत न्यूज नेटवर्कबिरुर। ‘मेरे दादा गुरु श्री विक्रमसूरीश्वरजी ने विमलनाथ भगवान की अंजनशलाका की थी, वहीं प्रतिमा की प्रतिष्ठा गुरुदेव स्थूलभद्रसूरीश्वरजी ने आज से २७ वर्ष पूर्व की थी तथा आज यहां बिरुर मंे नूतन नवग्रहयुक्त विमलनाथ सुवर्ण जिनालय की प्रतिष्ठा का सौभाग्य मुझे (तीसरी पी़ढी को) मिला है। बिरुर जैन संघ को मैं अंतरमन से आशीर्वाद देता हूं, जिन्होंने गुरु के वाक्य को मंत्रतुल्य माना, उसी से आज ऐसा अद्भुत शिल्पकलायुक्त नयनरम्य जिनालय का निर्माण हुआ।’’ यह कहा शिल्पकलामनीषी आचार्यश्री चंद्रयशसूरीश्वरजी ने। वे यहां सोमवार को विमलनाथ नवग्रह सुवर्ण जिनालय में विमलनाथ परमात्मा की जिनप्रतिमा, स्थूलभद्रसूरीजी की गुरुमूर्ति, अधिष्ठायक देव-देवी आदि सर्वप्रतिमाओं के प्रतिष्ठा मुहूर्त पश्चात् अपना उद्बोधन दे रहे थे। उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं से कहा कि परमात्मा से आज यही मांगना है कि ‘आपके अनंत गुणों में से मुझे एक गुण दे दीजिए, हमारी बुद्धि निर्मल कर दीजिए व अहंकार रहित हमारा जीवन कर दीजिए।’’ उल्लास और उमंग के भक्तिमयी वातावरण में गादीनशीं हुए विमलनाथ प्रभु के इस प्रतिष्ठा अवसर पर हेलीकॉप्टर से पुष्पवर्षा की गई। थाली डंका व घंटनाद किया गया। साथ ही चंद्रयशजी ने सूरीमंत्र से गर्भित मंत्रोच्चार पूर्वक वासक्षेप किया। ॐ पुण्याहं-पुण्याहं, प्रियंताम्-प्रियंताम् के मंत्रोच्चार से संपन्न हुए इस आयोजन अवसर पर आचार्यश्री ने कहा कि जितनी उल्लासमय भक्ति के साथ प्रभु की प्रतिष्ठा की जा रही है, इसी प्रकार उत्कृष्ट भक्ति नित्य पूजा के साथ श्रद्धालुओं को सदैव करनी है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक बुधवार को यहां सामूहिक विमलनाथ दादा का जाप होना चाहिए, इससे संघ की उन्नति होगी। साथ ही ॠद्धि-सिद्धि व समृद्धि सभी के सामने परिलक्षित होगी। समर्पण को कार्यसिद्धि का मंत्र बताते हुए चंद्रयशजी ने कहा कि यूं तो समस्त कार्य देव, गुरु के परम आशीष और कृपा से होते हैं, लेकिन दक्षिण भारत के इस एक छोटे से गांव में जैन शिल्पकला के खजाने के रुप में इतने भव्य जिनालय के निर्माण में चार सेवाभावी साधकों क्रमशः महावीर पोरवाल, ललित मेहता, संजय पोरवाल व महेश कांकरिया के योगदान को सदा याद रखा जाएगा। इस मौके पर चेन्नई के नमिनाथ स्थूलविहार किलपाक के अध्यक्ष पारसमल बैद ने आचार्यश्री के समक्ष चेन्नई में चातुर्मास का निवेदन किया। साथ ही विहार के कार्य को शीघ्र करवाए जाने का आग्रह किया। मंदिर पर ध्वजा और मूलनायक परमात्मा को विराजित करने का लाभ देवीचंद हुलासीदेवी वेदमूथा परिवार ने लिया। सुवर्ण मंदिर का लाभ शांतिबाई माणकचंद पितलिया ने तथा आचार्यश्री को कामली प्रदान करने का लाभ भवरलाल भीमराज कांकरिया परिवार ने लिया। बिरुर जैन संघ ने सिद्धाचल स्थूलभद्र धाम में मुख्य आदिनाथ दादा की टुंक के सन्मुख शांतिनाथ जिनालय का लाभ लेने की उद्घोषणा की। मंदिर निर्माण में सोमपुरा, मूर्तिकार, इंजीनियर, सुवर्णमंदिर का निर्माण करने वाले शिल्पकार सहित सभी योगदान देने वाले कार्यकर्ताओं का संघ के पदाधिकारियों ने सत्कार किया। प्रतिष्ठा महामहोत्सव में अनेकविध कमेटी, चिकमगलूर के अरिहंत सेवा मंडल, इवेन्ट कम्पनी मुंबई सहित अनेक महिला मंडलों की सदस्याओं का सहयोग भी उल्लेखनीय रहा।

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