दक्षिण भारत न्यूज नेटवर्कबेंगलूरु। स्थानीय जयनगर स्थित जैन स्थानक भवन में विराजित आचार्यश्री सुदर्शनलालजी म.सा. ने गुरुवार को अपने प्रवचन में कहा कि हर जीव सुख पाने के लिए पुरुषार्थ करता है। उन्होंने कहा कि जीवन में सुख की अनुभूति कम और दुख की अधिकता होती है। जैसे-जैसे साधन की प्राप्ति ब़ढती है, वैसे-वैसे दुख ब़ढता है। आचार्यश्री ने कहा कि प्रतिक्रमण करने से जीव अहिंसा आदि व्रतों के अतिचार को रोकता है। उन्हांेने कहा कि जितनी सुख के प्रति हमारी आसक्ति ब़ढती है, उतने ही ज्यादा पाप हमसे होते हैं। सुदर्शनलालजी ने कहा कि ज्यादा कामना करना अशांति व डिप्रेशन में जाने का कारण बनता है। संसार मंे सफल होने के लिए पर की जरुरत बताते हुए आचार्यश्री ने कहा कि पर के बगैर सहयोग के व्यक्ति संसार में सफल नहीं होता, यानी संसार हमेशा पराश्रयी होता है। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक साधना में जब व्यक्ति अकेला होता है तब सबसे ज्यादा सुखी होता है। साधना में परिग्रह जितना खतरनाक होता है, उतना ही परिचय खतरनाक होता है। साधना में अकेला रहना सुखद है, जबकि संसार में रहना दुखद है। आचार्यश्री ने यह भी कहा कि आत्मा और शरीर भिन्न-भिन्न हैं, यदि आत्मा को धर्म साधना में जो़ड लिया जाए तो हमारी आत्मा का कल्याण हो सकता है।

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