nadia murad
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ओस्लो। इस साल शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए दो नाम चुने गए हैं जिन्होंने यौन हिंसा पीड़ित बच्चियों और महिलाओं के लिए बड़ी मुहिम का नेतृत्व किया है। डॉ. डेनिस मुकवेगे ऐसी ज्यादती का सामना करने वाली महिलाओं के हक में लंबे अरसे से आवाज उठाते रहे हैं। वहीं 25 साल की नादिया मुराद की कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है। नादिया इराक से हैं और पिछले कई वर्षों से उनका मुल्क भयंकर हिंसा, आतंकवाद और अस्थिरता का सामना कर रहा है।

जब सीरिया और इराक में आतंकी संगठन आईएसआईएस ने दस्तक दी तो लोगों ने अंदाजा नहीं लगाया होगा कि यह हैवानियत की हद को भी पार कर जाएगा। आईएस के लड़ाके बेकसूर लोगों का खून ही नहीं बहाते, बल्कि वे बच्चियों और महिलाओं से दुष्कर्म भी करते थे। इराक-सीरिया की हजारों महिलाओं की तरह नादिया को इस बुरे अहसास से गुजरना पड़ा।

किसान की बेटी बनी नोबेल विजेता
इराक के एक यजीदी परिवार में जन्मीं नादिया मुराद के परिजन खेती करते थे। यह इराक का एक अल्पसंख्यक समुदाय है जिसे उसकी धार्मिक मान्यता के कारण कई बार असहिष्णुता का सामाना करना पड़ा है, लेकिन जब इराक के बड़े भूभाग पर आईएस का कब्जा हुआ तो जुल्म की सभी परिभाषाएं कम पड़ गईं।

आतंकियों ने ऐलान किया कि वे युद्ध में हासिल हुईं महिलाओं को बेचेंगे, क्योंकि वे उनकी गुलाम हैं। यही नहीं, उनकी गरिमा के ​साथ भी खिलवाड़ हुआ। नादिया सहित कई महिलाओं को इराक के बाजार में लाकर बेचा गया और बाद में उन्हें यौन दासी बनाया गया। यह सब इतना कटु अनुभव था कि बाद में कई महिलाओं ने टीवी कैमरों के सामने रो-रोकर आपबीती सुनाई।

जुल्म और सिर्फ जुल्म
उस दौरान आईएस के आतंकियों ने नादिया का अपहरण किया और उन्हें तीन महीने तक अपनी कैद में रखा। उनकी तरह हजारों यजीदी महिलाएं आईएस की कैद में थीं। यह तादाद 6,700 से ज्यादा बताई जाती है।

नादिया ने बताया कि उन्हें मोसुल में रखा गया, जो आईएस का गढ़ बन चुका था। आतंकी उनके साथ दुष्कर्म के अलावा बुरी तरह मारपीट करते थे। उन्हें सिगरेट से दागा जाता था। एक दिन जब दरवाजा ठीक से बंद नहीं था तो वे आईएस की कैद से निकल आईं।

बेपर्दा किया आईएस का चेहरा
नादिया ने दुनिया को आईएस की दरिंदगी के बारे में बताया और यह पीड़ा झेल चुकीं महिलाओं के पक्ष में आवाज उठाई। उल्लेखनीय है कि आईएस के आतंकी खासतौर पर यजीदी महिलाओं को निशाना बनाते थे, क्योंकि वे इस समाज को अपनी धार्मिक मान्यता के आधार पर दुश्मन मानते हैं।

अब नादिया नोबेल पुरस्कार से सम्मानित की जाएंगी। उन्होंने न केवल यजीदी बल्कि दुनिया की हर महिला के हक में आवाज उठाई है कि उनकी गरिमा का मान रखना चाहिए। नादिया को नोबेल मिलना उनसे कहीं ज्यादा इस पुरस्कार का ही सम्मान है।

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