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महंगाई की मार से त्रस्त जनता
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जब गर्मी ज्यादा होती है तब गन्ने का रस पीकर कलेजे को ठंडा किया जाता है। गन्ने की तासीर ठंडी होती है परन्तु इस समय तो अचानक इसने राजनीति में इतनी गर्मी पैदा कर दी है कि पार्लियामेंट के वातानुकूलित सभागार में भी धुआं उठ रहा है। केन्द्र सरकार को दो दिन से पूरे विपक्ष ने घेर रखा है। लोकसभा की कार्यवाही नहीं चलने दी जा रही। देश की राजधानी दिल्ली के आसपास के किसान महज एक दिन दिल्ली में जमा हुए तो केन्द्र की यूपीए सरकार को पता चल गया कि जिस गन्ने को वह ठंडा समझे बैठी थी, वह किसानों के हाथों में आते ही गर्म होने लगताहै। उसकी तपिश सरकार को इतनी महसूस हुई कि सरकार ने तुरन्त कह दिया कि वह नई गन्ना मूल्य नीति पर पुनः विचार करेगी। यह तो केवल गन्ना किसानों की तकलीफ की बात हुई, पूरे देश के नागरिक निरन्तर तेज गति से बढ़ रही महंगाई से त्रस्त हैं।
पिछले महीने भर में आलू की कीमत में शत प्रतिशत बढ़ोत्तरी हो गई है। आलू, प्याज, दाल ये ऐसी वस्तुएं हैं जो आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी हैं। कुछ वर्षों पूर्व तक जमाना ऐसा था कि आर्थिक रूप से कमजोर से कमजोर आदमी भी यह लाइनें गुनगुनाकर संतोष कर लिया करता था-दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ। अब दाल रोटी में से दाल ही इतनी महंगी हो चुकी है कि रोटी का जुगाड़ कहां से किया जाए, आदमी को समझ में ही नहीं आता। और प्रभु के गुण तो आदमी तब गाए न जब दाल-रोटी का जुगाड़ करने से उसे फुर्सत मिले।
देश में बढ़ रही महंगाई ने आम आदमी को त्रस्त कर दिया है और सरकार है कि आंकड़ों पर आंकड़े जारी कर यह बताने की कोशिश कर रही है कि महंगाई तो है ही नहीं। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया पूरे समय आंकड़ों में उलझे रहते हैं। उनसे जब भी महंगाई पर नियंत्रण की बात की जाती है तो वे बाकायदा आंकड़ों के माध्यम से बताते हैं कि किस प्रकार मुद्रास्फीति पर काबू पाया जा चुका है और वे यह विश्वास दिलाते हैं कि महंगाई निश्चित रूप से कम होगी। उन्हें यह कौन समझाए कि मुद्रास्फीति, जीडीपी ग्रोथ रेट और दूसरी तरह के तमाम आंकड़ों से घर में चूल्हा नहीं सुलगाया जा सकता, बच्चों को दाल रोटी की जगह मुद्रास्फीति नहीं खिलाई जा सकती, भूख से पिचके हुए पेट को जीडीपी ग्रोथ रट लगाकर शांत नहीं किया जा सकता। ऐसे हालातों में निर्धन लोग अपने परिवार का पेट नहीं भर पाते हैं और आत्महत्या करने को बाध्य हो जाते हैं। गरीबों को छोड़िए, मध्यमवर्गीय परिवारों की हालत भी कोई अच्छी नहीं है, वह भी कर्ज पर कर्ज ले लेकर अपना घर चलाने को मजबूर हैं और मोंटेक सिंह आहलुवालिया, वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी, पूर्व वित्तमंत्री व वर्तमान गृहमंत्री पी चिदंबरम बार-बार प्रधानमंत्री को भरोसा दिला रहे हैं कि चिंता की कोई बात नहीं है, सब ठीक हो जाएगा।
कभी-कभी लगता है कि मंत्रिमंडल के अग्रणी सदस्यों को सब्जी मंडी और किराना बाजार में खरीदी करने के लिए भेजा जाना चाहिए तो उन्हें पता लगे कि देश की जनता किन हालातों में जी रही है। परन्तु वास्तविकता यह है कि जो हमारे नीति नियंता हैं उनका वास्ता वास्तविकता से पड़ता ही नहीं। वे कागजों पर देश की समस्याओं का निपटारा करने में विशेषज्ञ हैं।
पेट्रोलियम मंत्रालय ने कल ही कहा है कि फिलहाल पेट्रोल और डीजल के दाम नहीं बढ़ेंगे। देश की जनता पर उनका यह अहसान ही तो है। अगर सरकार दाम बढ़ाना चाहे तो क्या कर सकता है आम आदमी? जब भी पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने का मन करता है, हमारे पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा फटाफट घोषणा कर देते हैं और जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव धड़ाधड़ गिरने लगते हैं तो देवड़ाजी मानो अंतर्ध्यान हो जाते हैं। वे किसी को नहीं दिखाई देते क्योंकि दिखाई देने पर पेट्रोल-डीजल की कीमतें कब कम होंगी, यह सवाल कोई न कोई पूछ ही लेता है। कोई उनको यह पूछे कि जब आपकी सरकार की नाक के तले हर जरूरी सामान की कीमतें बढ़ रही हैं और समूचा मंत्रिमंडल हाथ पर हाथ धरे बैठा देख रहा है तो फिर पेट्रोल-डीजल के दाम न बढ़ाने की मेहरबानी क्यों? जब जनता के धैर्य की परीक्षा ही लेनी है तो पूरी तरह से ले ली जानी चाहिए। लोकसभा चुनावों के पहले लग रहा था कि महंगाई मनमोहन सरकार की मौत का कारण बनेगी परन्तु आंकड़ों के बहकावे में आई जनता ने फिर से इसी सरकार को सौंप दी अपनी जिंदगी की चाबी। दोष जनता का भी नहीं है क्योंकि दूसरी किसी पार्टी को जिताकर सत्ता की कुर्सी पर बिठा भी देती तो क्या गारंटी थी कि वह तो महंगाई से निजात दिला ही देती। प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा भी जब खुद ही संकट में दिखाई देती है तो जनता किस पर विश्वास करे?
अब तो लगता है कि जिस प्रकार से दिल्ली और उसके आसपास के किसानों ने कृषिमंत्री शरद पवार से लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक सबकी नींद उड़ा दी है वैसे ही देश की आम जनता को भी महंगाई की लड़ाई सड़क से संसद तक लड़नी पड़ेगी। बिना आंदोलन के हमारे देश में कहां कुछ हो पाता है।
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