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जनता के सेवक ही बने जनता के शोषक : मधुकर द्विेवेदी

 

दुनिया के पचीस भ्रष्टतम देशों की श्रेणी में शुमार हो चुके हैैं। यह शर्मनाक खिताब हमें अभी हाल ही के एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षण से हासिल हुआ है। सर्वेक्षण में किसी भी देश के विकास में भ्रष्टाचार को एक बहुत बड़ी अवरोधक कड़ी मानते हुए भारत में भी विकास प्रक्रिया में ज्यादा गतिशीलता न आने का एक कारण यहां समाज के निचले स्तर से लेकर शीर्ष तक फैले भ्रष्टाचार को माना गया है। सर्वेक्षण में यह तथ्य सामने आया है कि भारत में भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहराई तक पहुंच चुकी हैं। इसका पोषण करने में यदि किसी वर्ग की सबसे अहम भूमिका है तो वह देश का तथाकथित जनसेवक और उसका संरक्षण प्राप्त नौकरशाहों का वर्ग है। इसे देखकर ऐसा लगता है कि भारत की राजनीति में नेता और भ्रष्टाचार का चोली दामन का संबंध बन चुका है। एक जमाने में जो "नेता' शब्द आदर का सूचक माना जाता था, आज उस शब्द ने अपनी गरिमा खो दी है। किसी भी राजनैतिक पार्टी में अब ऐसे आदर्श नेता नहीं दिखाई देते, जिनके जीवन में सदाचार, नैतिकता या अनुकरणीय जीवन शैली के दर्शन हों। पुरानी पीढ़ी के कुछ ही लोग ऐसे बचे हैं जिनका जीवन साफ-सुथरा रहा है और वे अब तक सम्मान पाते हैं। दरअसल, राजनीति अब समाज सेवा का जरिया न रहकर धनार्जन करने का एक सुगम माध्यम बन चुकी है। आज के जनसेवक जनता की सेवा नहीं बल्कि उसका शोषण करते हैं। जनसेवा का कथित लबादा ओढ़कर हर प्रकार के धतकरम किए जा रहे हैं। यद्यपि अभी भी राजनीति के क्षेत्र में उत्कृष्ट सोच रखने वाले ईमानदार व निष्पृह जन भी मिल जाएंगे लेकिन उनकी संख्या नगण्य है। बहुतायत उन नेताओं की है जिनका राजनीति में आने एकमात्र उद्देश्य धनार्जन करना है। हर राजनैतिक दल में भ्रष्टाचारी नेताओं की जमात मिल जाती है। कई राजनैतिक पार्टियों के नेताओं के ऊपर तो भ्रष्टाचार के तमाम मुकदमे विचाराधीन हैं। दरअसल, हमारे देश के कानून में इतनी खामियां और पेंचीदगियां हैं कि बचाव के तमाम चाहे-अनचाहे रास्ते निकल आते हैं जिनसे भ्रष्टाचार की दलदल में आकंठ डूबा "दागी' आराम से बेदाग बनकर निकल जाता है और हम कानून को कोसते रह जाते हैं। उच्च स्तर पर होने वाला आर्थिक भ्रष्टाचार व्यापक रूप से उजागर होने के बाद भी कानून की कमजोरियों के आगे वर्षों फाइलों में कैद रहता है और कई सालों बाद जब उस पर फैसला होता है तब तक तस्वीर का पहलू बदल चुका होता है। देश के विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं पर भ्रष्टाचार के संबंध में तमाम मुकदमे चल रहे हैं। पदों पर रहकर उसका दुरुपयोग करना और अकूत सम्पत्ति अर्जित करना उनका खास शगल हुआ करता है। आम जनता में इस बात का विश्वास घर कर गया है कि राजनेता छोटी-मोटी हेरा-फेरी नहीं करते। वे करोड़ों रुपए की हेराफेरी में ही हाथ डालते हैं। यह जानने के लिए किसी सर्वेक्षण की जरूरत नहीं है। बिना सर्वेक्षण भी यह बातें सबको उसी तरह से पता हैं जिस तरह से बच्चा जन्म लेने के साथ ही जान जाता है कि कोई मां उसे दूध जरूर पिलाएगी। इसके बावजूद भ्रष्टाचार से बचाव के इतने सारे रास्ते खुले हुए हैं कि भ्रष्टाचारियों पर हाथ डालना मुमकिन नहीं होता है। कुछ समय पहले कर्नाटक में सामने आई एक घटना ने इस मामले में फिर से चर्चाओं का दौर शुरू कर दिया है। इस मामले में कर्नाटक लोकायुक्त के विशेष स्थापना पुलिस ने राजधानी बेंगलूर स्थित विधायक विश्राम गृह से सत्तासीन पार्टी के एक विधायक को किसी व्यक्ति से लाखों रुपयों की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों दबोच लिया। आज तक लोकायुक्त को इस विधायक के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू करने के लिए विधानसभा अध्यक्ष से अनुमति ही नहीं मिल सकी है। विडम्बना तो देखिए कि सौ-पचास रुपए की हेराफेरी करने वाला सरकारी कर्मचारी कानून की गिरफ्त में आकर सजा पा जाता है लेकिन लाखों की रिश्वतखोरी करने वाला व्यक्ति ठाठ से घूमकर जनता को नैतिकता के पाठ पढ़ाता है। वह चिढ़ाता है उस कानून को जो शायद गरीबों के गिरफ्त में लेने के लिए बना है। कुछेक अपवादों को छोड़ दिया जाए तो आज के अधिकांश नेताओं में न चरित्र है, न नैतिकता है और न ही समाज के लिए कोई प्रतिबद्धता। शोषण उनके दैनन्दिन जीवन का हिस्सा बन चुका है। एक जमाने में नेताओं का आचरण व उनके कार्य करने के तौर-तरीके समाज के लिए अनुकरणीय हुआ करते थे, उनके विचारों को "ब्रह्म वाक्य' के रूप में सुना व माना जाता था,समाज उन्हें इज्जत की नजरों से देखता था, लेकिन आज परिदृश्य बदल चुका है। चरित्र, ईमान, देशप्रेम व जनता की भलाई का जज्बा नहीं दिखता। यदि इस काले जल की सफाई करने की ठोस पहल न की गई तो एक दिन देश का दिवाला निकलना तया है। भारत की भावी पीढ़ी भ्रष्टाचार रूपी नासूर के दर्द से सदियों तक कराहती रहेगी।  


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