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महिला साक्षरता की गति बढ़ानी होगी : मधुकर द्विवेदी

 

देश की प्रगति का मूल्यांकन करने का सबसे सरल पैमाना है वहां के निवासियों में शिक्षा का स्तर। शिक्षा के विस्तार का देश की प्रगति पर पूरा असर पड़ता है और वही समाज हर क्षेत्र में आगे बढ़ सकता है जब स्त्री-पुरुष सभी शिक्षित हों। दुनिया के विकसित देशों की तरक्की का आधार ज्ञान रहा है। बिना ज्ञान के कोई भी उपलब्धि हासिल नहीं की जा सकती और ज्ञान प्राप्त होता है शिक्षा से। शिक्षा ग्रहण किए बिना व्यक्ति में विवेक का उदय नहीं हो पाता, जिससे उसे सत्-असत् का निर्णय करने में दिक्कत आती है। हालांकि शिक्षा का क्षेत्र बड़ा व्यापक है लेकिन मोटे तौर पर यदि व्यक्ति सामान्य शिक्षा भी प्राप्त कर ले तो वह जीवन में आने वाली रोजमर्रा की उन दिक्कतों से बच जाता है, जिससे उसे अमूमन रू-ब-रू होना पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश में साक्षरता पर विशेष जोर दिया जा रहा है। साक्षरता मिशन की शुरुआत वर्ष 1988 में हुई थी और अब तक इस मिशन में करीब 3 हजार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। केन्द्र सरकार के साथ ही राज्य सरकारें भी अपने राज्यों में इस दिशा में काम कर रही हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में साक्षरता बढ़ाने के लिए साक्षरता मिशन संचालित किए जा रहे हैं। सरकारें निरंतर यह राग अलापती हैं कि आने वाले कुछ वर्षों में भारत में एक भी व्यक्ति निरक्षर नहीं बचेगा। इस दिशा में केरल ने बहुत पहले बाजी मार ली। उस राज्य में सौ प्रतिशत साक्षरता है, लेकिन दीगर राज्य अभी तक तमाम कोशिशों के बाद भी इस मुहिम में कामयाब नहीं हो पाए। वाकई निरक्षरता व्यक्ति के लिए एक बहुत बड़ा अभिशाप है। सभ्य समाज के निर्माण तथा उसके समरस विकास में निरक्षरता बाधा है। निरक्षर व्यक्ति दुनिया में वह चीजें नहीं हासिल कर पाता जो साक्षर व शिक्षित आदमी प्राप्त कर लेता है। यद्यपि भाग्यवश अनपढ़ व्यक्ति भी समाज में कई ऐसी महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कर लेते हैं जो उच्च शिक्षित को नहीं प्राप्त होतीं। मसलन, एक अनपढ़ महिला या पुरुष विधानसभा या लोकसभा सदस्य बन सकता है। व्यापार के क्षेत्र में अनेक ऐसे व्यक्ति मिलेंगे जो अंगूठा छाप होते हैं, लेकिन उनका व्यापार अच्छा चलता है। ऐसा अपवाद स्वरूप ही होता है। नि:संदेह, आज भारत में शिक्षा की काफी प्रगति हुई है। आजादी के बाद देश में शिक्षा के विस्तार की दिशा में जो प्रयास किए गए वे परिणाममूलक रहे। फलत: शिक्षा का दायरा भी तेजी से बढ़ता गया। अब भारत के गांवों में भी शिक्षा की रोशनी दिखाई देने लगी है। गांवों में पाठशालाएं खुल गई हैं, शिक्षक भी गांव पहुंच रहे हैं। तस्वीर का यह पहलू वाकई प्रशंसनीय है, परन्तु अभी भी हमारे देश में करोड़ों व्यक्ति अशिक्षित हैं, निरक्षर हैं। स्कूलों, शिक्षा केन्द्रों तथा आवश्यक संसाधनों की कमी के चलते शिक्षा से वंचित हैं। देश में अभी भी लड़कियां स्कूल जाने के मामले में लड़कों से पीछे हैं। पहले तो भारतीय समाज में लड़कियों की तुलना में लड़कों को शिक्षा देना ज्यादा जरूरी माना जाता रहा। इसका परिणाम यह निकला कि बालिका शिक्षा की रफ्तार कमजोर हो गई। आजादी के बाद भी कन्या-शिक्षा का प्रतिशत कम रहा परन्तु धीरे-धीरे अब लड़कियों की शिक्षा पर अभिभावकों की ओर से गंभीर पहल की जाती है और उच्च वर्ग के साथ ही मध्यम वर्गीय परिवार भी अपनी बेटियों की शिक्षा-दीक्षा पर धन खर्च करते हैं। यद्यपि गरीबी, पारिवारिक परिवेश तथा अन्य कारणों से अभी भी कम आय समूह के परिवारों की बालिकाएं शिक्षा नहीं ले पातीं जबकि गरीब परिवार की लड़कियों के लिए सभी राज्य सरकारों ने मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था कर रखी है क्योंकि किसी भी समाज में महिलाओं का साक्षर होना अत्यावश्यक है। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ ग्रामीण परिवेश अथवा निर्धन परिवारों से ताल्लुक रखने वाली महिलाएं ही निरक्षर हैं बल्कि लाखों की तादाद में उच्च आय वर्ग तथा शहरों में निवास करने वाले परिवारों के घरों की महिलाएं भी निरक्षरता के अभिशाप से ग्रस्त हैं। महिलाओं में साक्षरता का व्यापक विस्तार करने के लिए केन्द्र सरकार "साक्षर भारत' नामक एक कार्यक्रम शुरू करने जा रही है। इसका खास मकसद है कि देश के 365 जिलों में महिला साक्षरता में इजाफा किया जाए यहां उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने अपने अभिभाषण में महिला साक्षरता बढ़ाने पर विशेष बल दिया था। केन्द्र सरकार का लक्ष्य 11वीं पंचवर्षीय योजना में सात करोड़ लोगों को साक्षर बनाने का है, जिनमें से छह करोड़ महिलाएं होंगी। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल यह कार्यक्रम जल्दी ही शुरू करना चाहते हैं। इसमें राज्य सरकारों, गैर सरकारी संगठनों और स्वयंसेवी संस्थाओं की भी मदद ली जाएगी। गौरतलब है कि महिला साक्षरता पुरुष साक्षरता से आज भी 21 प्रतिशत कम है जो एक चिंताजनक स्थिति है। साक्षरता मिशन के नाम पर भारी-भरकम राशि खर्च करने के बावजूद हालात बदले नहीं हैं। (विनायक फीचर्स) केन्द्र से मिलने वाले पैसे का सुनियोजित तरीके से बंदरबांट किया जाकर फर्जी आंकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं। गांवों में तो आलम यह है कि साक्षरता मिशन सिर्फ कागजों में संचालित होते हैं। ग्राम प्रधान से लेकर ब्लाक और जिले के आला अधिकारी सभी का हिस्सा सुनिश्चित होता है। एक कनिष्ठ शासकीय कर्मचारी द्वारा बनाये गये फर्जी आंकड़े पर जिले से लेकर केन्द्र सरकार तक की मोहर लग जाती है। ऐसी स्थिति में साक्षरता मिशन का कोई मतलब नहीं निकलता। सरकार को इस दिशा में गंभीरतापूर्वक यह देखना पड़ेगा कि साक्षरता मिशन जिन लोगों को साक्षर बनाने के लिए संचालित है, क्या वे लोग इससे वाकई लाभान्वित हो रहे हैं या नहीं। साक्षरता मिशन की निरंतर मानीटरिंग करनी पड़ेगी और घपले-घोटाले करने वालों के विरुद्ध कठोर कदम उठाने पड़ेंगे। अगर सतर्कता नहीं बरती गई तो चाहे जितना पैसा खर्च कर लिया जाय, उसके सार्थक परिणाम नहीं निकल पाएंगे। देश की भावी पीढ़ी को निरक्षरता के अभिशाप से मुक्ति दिलाने के लिए महिलाओं को साक्षर बनाने की दिशा में तेजी से कदम उठाने होंगे तभी "साक्षर भारत' जैसे मिशन अपनी सार्थकता सिद्ध कर पाएंगे।  


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