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मंत्रियों के भ्रष्टाचार पर रोक कैसे लगे : डॉ. भरत झुनझुनवाला

 

न्द्रीय सतर्कता संगठनों को सम्बोधित करते हुए प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने स्वीकार किया कि पुलिस छोटे अपराधियों को शीघ्र दबोच लेती है लेकिन बड़े अपराधी पकड़ में नहीं आते। प्रधानमंत्री की भावना स्वागत योग्य है लेकिन समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ें प्रधानमंत्री की कैबिनेट में ही हैं। उनके समर्थकों में से कोई चारा घोटाले का आरोपी है तो कोई मूर्तियां बनवाने का। ऐसे में प्रधानमंत्री के हाथ बंध जाते हैं। भ्रष्ट मंत्रियों पर कार्रवाई करने से उनकी सरकार गिर सकती है। मुद्दा यह है कि भ्रष्ट मंत्रियों पर अंकुश कैसे लगाया जाए? इस कार्य में कार्यपालिका असफल हो चुकी है। समय-समय पर विभिन्न आईएएस अफसरों ने भ्रष्ट मंत्रियों के विरुद्ध आन्दोलन छेड़े हैं परन्तु ये कभी लम्बे समय तक नहीं चले। उधर, केन्द्रीय सतर्कता संगठनों का दायरा छोटा ही है। इनके कर्मचारियों के लिए अपने मालिक की सेवा करना जरूरी है। वे जिस मालिक का नमक खाते हैं उसी के विरूद्ध भ्रष्टाचार का मुहिम उन्हें गलत दिखता है। चोरों के गिरोह का ड्राइवर यदि चोरी के विरुद्ध मुहिम छेड़ेगा तो निश्चित तौर पर निकाल दिया जाएगा। न्यायपालिका भी मंत्रियों पर अंकुश लगाने में असफल रही है क्योंकि न्यायधीशों की नियुक्ति मंत्री करते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद किसी आयोग की सदस्यता मंत्री की कृपा से ही प्राप्त होती है। अतः हवाला और बोफोर्स जैसे भ्रष्टाचार के मामलों में न्यायपालिका भी तकनीकी बिन्दुओं की आड़ में मंत्रियों पर कार्रवाई करने से इन्कार कर देती है। न्यायपालिका स्वयं भी भ्रष्टाचार से परे नहीं है जैसे किसी न्यायाधीश को भेजा गया नोटों का पैकेट संयोगवश सार्वजनिक जानकारी में आ गया। कुछ अपवाद भी हैं जैसे इंदिरा गांधी के चुनाव को चुनौती देने वाली याचिका पर न्यायपालिका ने सख्त निर्णय दिया था। किसी मुख्य मंत्री पर चारा घोटाले के मामले में भी न्यायपालिका ने सख्त कार्रवाई की थी। इन अपवादों से इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती है कि न्यायपालिका वास्तव में कार्यपालिका के ही अधीन है। कहावत है, 'यथा राजा तथा प्रजा'। मंत्रियों के भ्रष्ट होने से जनता में भ्रष्ट आचरण मान्य हो गया है। नैकिता के इस पतन का मूल कारण फकीरियत का अभाव है। पुरातन पाटलीपुत्र में सिकन्दर के राजदूत मेगास्थनीज एक रोचक वृत्तान्त बताते हैं। सिकन्दर ने विजय हासिल करने के बाद भारत के लोगों के विचार जानने की कोशिश की। उन्हें बताया गया कि डनडमी नाम के एक सन्त हैं जो उनके प्रश्नों का उत्तर दे सकते हैं। सिकन्दर ने अपने सिपाही डनडमी के पास भेजे और कहलाया कि यदि वे आते हैं तो उन्हें इनाम दिया जाएगा और यदि वे इन्कार करते हैं तो उनका सिर घड़ से अलग कर दिया जाएगा। इस पर डनडमी ने उत्तर दिया, "सिकन्दर जिन वस्तुओं का मुझे प्रलोभन दे रहे हें वे मेरे लिए बेकार हैं। मेरे लिए कीमती ये पत्तियां हैं जो मेरा घर हैं, कीमती ये पौधे हैं जो मुझे भोजन देते हैं और पानी है जिसे मैं पीता हूं। मैं जहां चाहूं, वहां जाता हूं। मुझे कोई ऐसी चिन्ता या जरूरत नहीं है जिसके कारण मुझे अनचाहे कर्म करने पड़ें। सिकन्दर मेरे सिर को काट दे तो भी मेरी आत्मा को नष्ट नहीं कर सकता है।' इस पर सिकन्दर ने स्वीकार किया कि डनडमी का दर्जा उनसे ऊंचा है। वे स्वयं नतमस्तक होकर डनडमी से मिलने गए। ऐसा ही आचरण तिरुवल्लुवर, कबीर, रहीम, मीराबाई आदि सन्तों ने अपनाकर भारत के राजा एवं जनता को धर्म के रास्ते पर लाया था। इस सच्ची धर्म सत्ता के अभाव में मंत्री भ्रष्ट हो चले हैं और उनकी देखादेखी जनता भ्रष्ट हो गई है। यह सच है कि मंत्रियों के भ्रष्टाचार पर वही नियंत्रण कर सकता है जो स्वयं अपनी जीविका के लिए राजसत्ता पर निर्भर न हो। नाव पर बैठा आदमी अपनी डूबती नाव को नहीं बचा सकता है। किनारे ठोस जमीन पर खड़ा व्यक्ति ही डूबती नाव को रस्सी फेंक सकता है। अतः हमें ऐसी सत्ता को पोषित करना होगा जो मंत्रियों से स्वतंत्र हो। इस दुराचारी व्यवस्था के विरुद्ध डनडमी, कबीर और मीराबाई जैसे लोग ही आवाज उठा सकते हैं। धर्मगुरुओं द्वारा आज यह आवाज नहीं उठाई जा रही है क्योंकि वे नोबल प्राइज या पद्मश्री हासिल करने या सरकारी भूमि पर किए गए अपने अवैध कब्जे को बचाने में लगे हुए हैं। जो फकीरी भ्रष्ट राजसत्ता का सामना कर सकती है उसका र्धमसत्ता में भी आज नितांत अभाव दिखता है। देखा गया है कि रामनाथ गोयन्का जैसे मीडिया मुगल ने जब भ्रष्ट राजसत्ता के खिलाफ आवाज उठाई तो सरकार उनके पीछे हाथ धोकर पड़ गई। फलस्वरूप उनके द्वारा शुरू किया गया अखबार ही मृतप्राय हो गया है। कुछ गांधीवादियों ने इमरजेंसी का विरोध किया तो सरकारी अनुदान से चलने वाले उनकी संस्थाओं पर कुड़ाल कमीशन बिठा दिया गया। निष्कर्ष निकलता है कि राजसत्ता पर नियंत्रण कबीर जैसे फकीर ही कर सकते हैं। न्यायपालिका, धर्मसत्ता, सामाजिक कार्यकर्ता आदि द्वारा यह कार्य सम्भव नहीं है क्योंकि मूल रूप से ये सब राजसत्ता पर आश्रित हैं। इस स्वतंत्र सत्ता के महत्व को तमाम विचारधाराओं में स्वीकार किया गया है। गांधीजी ने इस सत्ता को रचनात्मक कार्यकर्ता की संज्ञा दी थी। उन्होंने सोचा था कि कार्यकर्ता सरकार से स्वतंत्र रहकर जनता को सही व्यक्ति को वोट देने की शिक्षा देंगे। लेनिन ने इस बात को पार्टी एवं सरकार के अंतर के रूप में परिभाषित किया था। मनुस्मृति में कहा गया कि ब्राह्मण वह है जो संग्रह न करे। अच्छा ब्राह्मण वह है जिसके पास मात्र तीन वर्षों के लिए पर्याप्त अन्न हो। श्रेष्ठ वह है जिसके पास तीन दिनों का अन्न हो। सर्वश्रेष्ठ वह है जिसे पता न हो कि अगला भोजन कहां से आएगा। ऐसे ब्राह्मण द्वारा ही क्षत्रिय राजसत्ता पर अंकुश संम्भव हो सका था। भ्रष्टाचार के वर्तमान दौर पर अंकुश तभी लगेगा जब रचनात्मक कार्यकर्ता, पार्टी एवं ब्राह्मण की सत्ता को समाज सम्मान देगा। प्रधानमंत्री से ज्यादा आशा करना हमारी भूल होगी।  


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