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हर कदम नई सफलता की इबारत

 

एक नया भारत बनाना उनके अजेंडे में शामिल है। इस अजेंडे में उनके पति जॉन शॉ ने उनका हमेशा बखूबी साथ दिया। यही नहीं, किरण के इस सपने को सच करने के लिए दोनों ने साथ काम किया है कि भारत में विकसित कैन्सर की दवा को पूरी दुनिया में अपनाया जाए।
वर्ष 1978 का भारत और उस समय कम पहचाने जाने वाले शहर बेंगलूर का सामाजिक ताना-बाना ऐसा नहीं था कि कोई महिला अपनी प्रतिभा के दम पर उद्योग जगत के शीर्ष तक पहुंचने का सपना संजो लेती। 23 मार्च, 1953 में बेंगलूर में जन्मीं किरण मजूमदार शॉ को भी समाज के इस रुख का सामना करना पड़ा। उन्हें उनके पिता से कुछ मानवीय मूल्य प्राप्त हुए थे जिनके दम पर, जब भी वह खुद को आसमान से गिरता हुआ महसूस करतीं, तभी कोई नई सोच उन्हें थाम लेती। उनके पिता ने उनसे कहा था कि किसी भी बात को पूरी तरह से जाने या समझे बिना उसके बारे में अपनी राय कायम करना गलत है। यह तब की बात है जब किरण स्कूल की छात्रा थीं। उन्हें इस बात पर शर्म आती थी कि उनके पिता शराब उद्योगों के लिए काम किया करते थे। एक दिन जब उन्होंने अपने पिता को इसके बारे में बताया तो उन्होंने किरण को अपने काम के बारे में पूरी जानकारी दी और कहा कि वे शराबखोरी को बढ़ावा नहीं देते बल्कि शराब निर्माण के विज्ञान से जुड़े हुए हैं। उनकी बातों को किरण ने आज तक अपने मन में गांठ बांधकर कर रख रखा है। यही मूल्य हैं जो किरण को नई ऊंचाइयों का संकेत देते हैं और वह उसे हासिल करने के लिए चल पड़ती हैं पूरे दम-खम के साथ। अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत में किरण पपीते से कुछ लाभदायक एंजाइम प्राप्त करने और उसे पूरे देश में बेचने के लिए एक अदद उद्योग स्थापित करना चाहती थीं। उनके पास इस काम की समझ थी, आवश्यक शिक्षा, प्रशिक्षण और अनुभव भी था। फिर भी शुरुआती पूंजी के लिए उनके ऋण आवेदनों पर गौर करने के लिए बैंक तैयार नहीं थे। कोई और होता तो शायद अपना माथा पीटकर सपनों का बुलबुला खुद ही फोड़ देता लेकिन किरण मजूदार शॉ ने ऐसा नहीं किया। समाज और इतिहास को बदलने की जद्दोजहद में उन्हें दिलचस्पी नहीं थी। वह भारतीय महिलाओं की सफलता का नया इतिहास लिखना चाहती थीं। उनके अंदर की यह चिनगारी वर्ष 1978 में मात्र 10 हजार रुपए के निवेश से एक छोटी-सी कंपनी के रूप में जमीन पर आई। आज यह कंपनी बायोकॉन लिमिटेड के नाम से देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र की अग्रणी कंपनीयों में शुमार की जाती है। इस कंपनी की सफलता की कहानियां 30 वर्षों में लगातार संकलित होती गईं और इसकी लोकप्रियता भी बढ़ती गई। वर्ष 2004 में जब इसका सार्वजनिक निर्गम बाजार में आया तो प्रारंभिक आंकलन से 30 फीसदी अधिक लोगों ने इसके शेयर खरीदने में दिलचस्पी जताई। उसी वर्ष किरण मजूमदार शॉ देश की सबसे अमीर महिला भी घोषित कर दी गईं। उस वर्ष वित्तीय सर्वेक्षकों ने उनकी कुल निजी सम्पत्ति की कीमत 2 खरब 10 अरब रुपए(480 मिलियन अमेरिकी डॉलर) आंकी थी। बायोकॉन लिमिटेड की अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक(सीएमडी) होने के नाते उनके पास इस कंपनी के 40 प्रतिशत शेयर हैं। अब किरण को कोई पैसों के नजरिए से नहीं तौलता। वर्ष 2009 में उन्हें अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका फोर्ब्स ने विश्व की 100 सर्वाधिक प्रभावशाली महिलाओं की सूची में स्थान दिया है। यह स्थान उन्हें कारोबारी सफलता का नेतृत्व करने के साथ ही जीवन के प्रति उनके सुलझे हुए दृष्टिकोण को भी ध्यान में रखते हुए दिया गया है। जिस समय घरेलू बाजार से पूंजी संग्रह करने के लिए बायोकॉन के शेयर लांच किए गए, क्या उस समय शेयर आवेदनों में वह बैंक भी शामिल था जिसने किरण मजूमदार शॉ का ऋण आवेदन खारिज कर दिया था? इस प्रकार के प्रश्नों में उलझना वह कतई पसन्द नहीं करती हैं। बेंगलूर के बिशप कॉटन गर्ल्स स्कूल, माउंट कार्मेल और बेंगलूर विश्वविद्यालय से शुरुआती स्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने जो सफर शुरू किया उस पूरे सफर के दौरान यह प्रश्न उन्होंने खुद से कभी किया ही नहीं। उनके अंदर से कोई नगाड़े की चोट पर उनसे कह रहा था, 'सारे बंधन तोड़कर आजाद हो जाओ, बहुत बड़ी हो जाओ'। अगर समाज से टकराना उनका ध्येय होता तो वह पद्म भूषण (वर्ष 2005) और पद्मश्री जैसे शीर्ष नागरिक पुरस्कारों तक शायद ही पहुंच पातीं। उन्होंने तो भारत से अपना सफर शुरू करने के बाद पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाने का लक्ष्य रखा था जो अक्षरश: पूरा भी हुआ है। वह मानती हैं कि वर्ष 1973 में ऑस्ट्रेलिया जाकर वहां के बॉलारट इंस्टीटयूट ऑफ एडवान्स्ड एजुकेशन( जो अब यूनिवर्सिटी ऑफ बॉलारट के नाम से जाना जाता है) में बीयर बनाने की तकनीक पढ़ते समय उनके सामने कुछ निराश करने वाली प्रतिक्रियाएं आईं। उनसे कइयों ने कहा कि यह मर्दों के एकाधिपत्य का क्षेत्र है लेकिन अपने परिवार की मदद और विशेष तौर पर अपने पिता के समर्थन के कारण उन्होंने इस प्रकार की बातों की अनदेखी कर अपने आगे के रास्ते पर ध्यान केन्द्रित रखा। एक वर्ष बाद उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी कर कार्लटन एंड युनाइटेड बेवरेजेस में प्रशिक्षु बीयर निर्माता के रूप में काम करना शुरू कर दिया। वर्ष 1978 में वह आयरलैंड की कंपनी बायोकॉन बायोकेमिकल्स लिमिटेड से जुड़ गईं और फिर कभी उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उद्योग जगत में नई-नई सफलताओं की इबारत लिखती हुईं किरण मजूमदार शॉ ने अपने व्यक्तित्व के अन्य पहलुओं को भी निरंतर विकसित करना जारी रखा। उन्होंने बीयर बनाने की तकनीक को एक कला के नजरिए से देखा। हालांकि वह कार्लटन एंड यूबी से अलग होने के बाद से अपने लिए जैव-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आगे बढ़ने का रास्ता चुन चुकी थीं लेकिन बीयर बनाने के बारे में अपनी तमाम जानकारियों को उन्होंने एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया। 'एल एंड आर्टी' नाम की इस किताब में उन्होंने दुनिया भर के मशहूर बीयर निर्माता घरानों के साथ ही बीयर बनाने की तकनीक और कला के बारे में लिखा। अपनी लिखी पंक्तियों को उन्होंने कई मशहूर चित्रकारों की पेंटिंग्स के माध्यम से भी अभिव्यक्ति दी। उनके व्यक्तित्व का दूसरा पहलू समाज के व्यापक हितों के बारे में रचनात्मक उपाय तलाशने वाली महिला का है। वह मीडिया के माध्यम से जिम्मेदारियां बांटने और निभाने का संदेश आम जनता को देती हैं तो राज्य व केन्द्रों की सरकारों को भी नागरिकों के जीवन-स्तर में बेहतरी के रास्ते सुझाती हैं। वह कर्नाटक विजन ग्रुप की अध्यक्ष हैं तथा बेंगलूर अजेंडा टास्क फोर्स(बीएटीएफ) में भी शामिल हैं। इन संगठनों को अपनी सलाह सेवाओं से वह लगातार सही रास्ता दिखाने का प्रयास करती रही हैं। उनको अपने शहर बेंगलूर से खास ही लगाव है। बीएटीएफ में उनका शामिल होना इसी बात का संकेत है। वह महिलाओं और पुरुषों की समानता और महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण के बारे में भी काफी गहराई से सोचती हैं। विभिन्न सरकारों से अलग-अलग मंचों पर वह मांग कर चुकी हैं कि अगर किसी भारतीय कंपनी में महिला कर्मचारियों की संख्या कुल कार्यबल के 30 प्रतिशत से अधिक हो तो उस कंपनी को अतिरिक्त सब्सिडी का लाभ दिया जाए। गरीब तबकों की महिला उद्यमियों को विशेष वित्तीय प्रोत्साहन देने और स्वरोजगार की इच्छा रखने वाली वंचित तबकों की महिलाओं को रियायती दरों पर व्यावसायिक शिक्षण व प्रशिक्षण देने की मांग भी वह लगातार करती रही हैं। आज के इस प्रतियोगितापूर्ण माहौल में भी महिलाओं के साथ पेश आने वाली समस्याओं को वह पूरी तरह से जानती और समझती हैं। इन सबके बीच कार्यस्थल पर महिला कर्मचारियों के यौन-उत्पीड़न और पदोन्नति के मामलों में बड़े औद्योगिक घरानों द्वारा भी महिलाओं की अनदेखी किए जाने का वह विरोध करती हैं। अपने इस बहुमुखी व्यक्तित्व की ही तरह किरण मजूमदार शॉ ने अपनी कंपनी बायोकॉन को भी कई रास्तों पर आगे बढ़ाया। यह एक तरफ दुनिया की एकमात्र ऐसी कंपनी बन चुकी है जो मानव शरीर के लिए जरूरी एंजाइम इन्सुलिन कृत्रिम रूप से बनाती है तो दूसरी तरफ इसे पहली बार ह्मूमैनाइज्ड मोनोक्लोनल एंटीबॉडी पर आधारित दवा बायोमैब-ईजीएफआर बनाने की उपलब्धि भी हासिल हुई है। इस दवा को सिर और गले के कैन्सर से लड़ने में सर्वाधिक प्रभावशाली माना जाता है। बायोकॉन लि. अब दुनिया भर की जैव-तकनीक क्षेत्र की कंपनियों के लिए शोध का केन्द्र बनने की और भी अग्रसर है। दुनिया की शीर्ष तकनीक और वैज्ञानिक प्रतिभा से लैस इस कंपनी की प्रयोगशाला कई बहुराष्ट्रीय दवा निर्माता कंपनियों को अपनी सेवाएं दे रही है। किरण मजूमदार शॉ ने इस कंपनी को भारत की सीमाओं के अंदर समेटकर रखने की कोशिश कभी नहीं की। उन्होंने बायोकॉन द्वारा बनाई गई ह्मूमैन इन्सुलिन को अमेरिकी बाजार में पहुंचाने के लिए अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन(यूएसएफडीए) की अनुमति भी हासिल कर ली जो उनकी बड़ी उपलब्धि थी। इन सबके साथ ही वह जैव-तकनीक क्षेत्र को कई कंपनियों के अधिग्रहण की योजना भी बना रही हैं। उनकी नजर में खास तौर पर उत्तरी अमेरिका के कई देश हैं। बहरहाल, इन सब बातों के लिए वह निश्चित दीर्घावधि योजना के तहत ही कदम आगे बढ़ाना चाहती हैं। एक नया भारत बनाना उनके अजेंडे में शामिल है। इस अजेंडे में उनके पति जॉन शॉ ने उनका हमेशा बखूबी साथ दिया। यही नहीं, किरण के इस सपने को सच करने के लिए दोनों ने साथ काम किया है कि भारत में विकसित कैन्सर की दवा को पूरी दुनिया में अपनाया जाए। जॉन शॉ खुद भी किडनी कैन्सर के शिकार हो गए थे जिसे डॉक्टरों ने पूरी सक्रियता के साथ दूर कर दिया है। शायद इस जोड़ी को अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते जाने की प्रेरणा इस घटना से भी मिलती हो! किरण स्वीकार करती हैं कि उनके पति को कैन्सर होने का पता लगना भी उनके लिए एक बड़ा मानसिक आघात था। उसी दौरान उन्होंने कैन्सर की पीड़ा से निपटने में मददगार मनोवैज्ञानिक तत्वों को जाना था। इस देश में कैन्सर से निपटने की कारगर दवा विकसित करने की जरूरत को अपने दिल से महसूस किया था। निस्संदेह जॉन शॉ का कैन्सर के चंगुल से छूट जाना किरण के लिए एक बड़ी राहत की बात है।

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