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मिर्जापुर में सबसे पुरानी है बच्चों की रामलीला
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मिर्जापुर। भले ही इस इलेक्ट_ानिक युग में दुर्गा पूजा एवं रामलीलाएं हाईटेक हो गई हैं पर उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के पुरानी दशमी में बच्चों का, बच्चों के लिए तथा बच्चों द्वारा अनोखी रामलीला का मंचन अब भी हो रहा है। अन्य रामलीलाओं से अलग इस रामलीला में बच्चे ही राम से लेकर रावण तक के पात्रों का अभिनय करते हैं और बच्चे ही व्यवस्था देखते हैं। गोधुली बेला में पूर्ण साज सज्जा से होने वाली इस लीला को देखने के लिए भारी संख्या में केवल बच्चे ही जमा होते हैं। न ध्वनि विस्तारक यंत्र न सुरक्षा व्यवस्था। मजेदार बात यह है कि लीला के अभिनय के दौरान कभी कभी रामदल और रावणदल में वास्तविक मारपीट कर बच्चे सिर भी तुड़वा बैठते हैं। ऐसे समय में पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ता है।
जिले में अन्य स्थानों पर जब रामलीलाएं शुरू होती हैं तब तक यहां की लीला समाप्त हो चुकी होती है। दस दिनों तक चलने वाली यह अद्भुत रामलीला बच्चों के आकर्षण का केन्द्र है। भगवान राम के जंगल प्रवास से यहां की रामलीला शुरू होती है। पहले दिन कौआ बना जयन्त सीता के चरण को चोंच से घायल कर दर दर भटकता है। फिर यहां से आगे की लीला दिन प्रतिदिन आगे बढ़ती हुई दशहरे के दिन रावण वध होकर समाप्त होती है। 25 फीट ऊॅचे चबूतरे पर बने मंच रामटेक पर भगवान राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ विराजमान होते हैं तो सामने बड़े मैदान में रावणदल सज जाता है। पूरे वेष भूषा में फिर शुरू होती है लीला। लीला शुरू होने से पूर्व नगर के मध्य चौबेटोला मुहल्ला में बने राजगद्दी से लीला के अनुसार प्रतिदिन सूर्पणखा, खरदूषणदल, हनुमान दल, राक्षसदल नगर भ्रमण कर गाजे बाजे के साथ यहां आता है। बच्चोें के इस दल के साथ भारी संख्या में दर्शक बच्चे भी पीछे-पीछे पुरानी दशमी रामटेक तक आते हैं। बालसुलभ इस लीला का बच्चे जहां एक ओर आनन्द उठाते हैं। कौतूहलपूर्ण नेत्राें से देखते हैं वहीं अपने अभिभावक के कंधे पर सवार छोटे बच्चे कभी लीला के युध्द को देखकर रोने भी लगते हैं। लीला के दौरान कभी-कभी वास्तविक युध्द भी हो जाता है। रामदल व रावणदल में ही ंनहीं बल्कि राक्षस व बंदर बने बच्चे आपस में ही लड़ जाते हैं। हालांकि दशहरे के दिन यहां बड़ा मेला लगता है जिसमें स्त्री, पुरुष, वृध्द, बालक हजाराें की संख्या में भाग लेते है लेकिन उस दिन भी लीला का समय वही रहता है।
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