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नक्सली दुस्साहस बढ़ा सरकारों की नाकामी का असर
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| मनमानी चरम पर |
क्सली संगठनों का उत्पात चिंता बढ़ाने वाला है। पांच राज्यों में उनके द्वारा घोषित बंद के दौरान यह स्पष्ट हुआ है कि ताकत के साथ उनका दुस्साहस भी बढ़ रहा है। प्रभावित इलाकों में उनकी मनमानी चरम पर है। वे लगातार दुस्साहसिक घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं तो सरकारें जुबानी जमा-खर्च से आगे कोई कदम ही नहीं बढ़ा पा रही हैं।
बंगाल से शुरू हुए नक्सलवाद ने धीरे-धीरे कई राज्यों को अपनी चपेट में ले लिया। सरकारों की ढुलमुल नीति और स्थानीय राजनेताओं ने उन्हें खाद-पानी मुहैया कराकर पुष्पित-पल्लवित होने दिया। अब यह विशाल वट वृक्ष बन चुका है। देखते ही देखते इसकी जड़ें इतनी गहरी समा गईं कि अब इन्हें उखाड़ना मुश्किल साबित हो रहा है। यह उनके लिए भस्मासुर तो बन ही गया है जिन्होंने इसे खाद पानी दिया था अब देश के लिए भी खतरा साबित हो रहा है। दरअसल नक्सालियों के इस बढ़ते प्रभाव के लिए हमारी नीतिगत सोच जिम्मेदार है जो किसी भी समस्या को अत्यधिक जटिल बनाए बिना निपटाने पर भरोसा नहीं करती।
राज्य हो या केन्द्र दोनों इससे कड़ाई से निपटने की जगह एक-दूसरे पर जिम्मेदारी थोपते ही नजर आते हैं। केन्द्र सरकार कानून-व्यवस्था को राज्यों का मामला बताकर पल्ला झाड़ लेता है तो राज्य संसाधनों का रोना रोकर अपने को किनारे कर लेते हैं। किसी बड़ी घटना के बाद नक्सलवाद से लोहा लेने की बात जरूर कह दी जाती है। इसी लचर नीति के फलस्वरूप कई जगहों पर नक्सलियों की समानांतर सरकार चल रही है। लोग कानून की जगह नक्सलियों के आदेश मानने को विवश हैं। जैसे-जैसे इनके पास हथियारों का जखीरा बढ़ रहा है, उसी अनुपात में वे देश की एकता तथा अखंडता के लिए बड़ी चुनौती भी बनते जा रहे हैं। सरकारी रीति-नीति के साथ ही खुफिया एजेंसियों की असफलता भी नक्सलियों के बढ़ते दुस्साहस के लिए जिम्मेदार है। खुफिया एजेंसियां यह भी नहीं जानती हैं कि नक्सलियों को मिलने वाले हथियारों का स्रोत क्या है?
मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त की गई। इस पर पहले भी चिंता व्यक्त की जा चुकी है। पहले भी प्रतिबध्दताएं जताई गई हैं। बात जब उन पर अमल करने की आती है तो सब कुछ भूल जाते हैं हमारे शासन एवं प्रशासन में बैठे लोग।
अभी फिर से नक्सलियों के विरुध्द ठोस कार्य योजना की बात सामने आई है। यह उपयोगी तभी होगा जब राज्य एवं केन्द्र तालमेल बना कर इनके सफाए की दिशा में कार्य करें। इसके लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति की आवश्यकता है। सेना का सहयोग लेने में भी सरकार को गुरेज नहीं करना चाहिए। देश द्रोहियों के खिलाफ होने वाली हर कार्यवाही नक्सलियों के विरुध्द होनी चाहिए। ऐसा नहीं होगा तो नक्सली संगठन दिन-प्रतिदिन और अधिक एकजुट, ताकतवर होते जाएंगे फिर उनकी मनमानी पर आश्चर्य व्यक्त करने के सिवा हमारे पास कुछ और नहीं होगा।
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