judiciary symbolic pic
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मिर्जापुर। कहते हैं कि वक्त पर न्याय न मिलना किसी अन्याय से कम नहीं है। कुछ ऐसा ही हुआ है मिर्जापुर की गंगा देवी के साथ। वे न्याय की आशा में ही परलोक सिधार गईं। करीब 41 साल चले इस मामले में अब निर्णय आया है। यह मामला 312 रुपए की रकम से जुड़ा है जिसके लिए अदालतों के कई चक्कर लगा चुकी गंगा देवी को अपनी ज़िंदगी में तो इंसाफ नसीब नहीं हुआ। अब जब फैसला उनके हक में आया तो मालूम हुआ कि उनकी मौत हो चुकी है।

जानकारी के अनुसार, मिर्जापुर की जिला अदालत में 312 रुपए की कोर्ट फीस के लिए लड़े गए इस मुकदमे में 41 साल तक सुनवाई चलती रही लेकिन महिला अपनी ज़िंदगी में वह दिन नहीं देख सकी जब अदालत ने उसके पक्ष में फैसला दिया। गंगा देवी की 2005 में ही मौत हो चुकी है।

क्या है मामला?
दरअसल 1975 में मिर्जापुर जिला जज ने एक जमीन के मामले में गंगा देवी के खिलाफ प्रॉपर्टी अटैचमेंट का नोटिस जारी किया था। इसके बाद गंगा देवी ने फैसले को न्यायालय में चुनौती दी। वर्ष 1977 में फैसला उनके पक्ष में आया। गंगा देवी का एक और इम्तिहान उसके बाद शुरू हुआ। जिला अदालत ने उन्हें कहा था कि वे फीस के रूप में 312 रुपए जमा कराएं। आज यह मामूली रकम लगती है लेकिन उस जमाने में बड़ी रकम हुआ करती थी। गंगा देवी ने रकम जमा करा दी। वे अपने पक्ष में आए फैसले की प्रति लेने कोर्ट गईं तो पाया गया कि उन्होंने 312 रुपए की पर्ची जमा नहीं कराई। वह पर्ची कहीं गुम हो चुकी थी।

हक के लिए कुर्बान ज़िंदगी
इस पर कोर्ट ने उन्हें दोबारा फीस जमा करने के लिए का निर्देश दिया। इसी रकम के लिए गंगा देवी ने एक और न्यायिक लड़ाई लड़ी। आखिरकार 31 अगस्त, 2018 को मिर्जापुर सिविल जज ने फैसला गंगा देवी के पक्ष में सुनाया। अपनी न्यायिक जीत देखने के लिए गंगा देवी वहां मौजूद नहीं थीं। करीब 13 साल पहले उनका देहांत हो चुका है। इन 41 वर्षों में उनकी फाइल 11 जजों पास गई, लेकिन फैसला मौत के बाद आया।

मौत के बाद फैसला
मामले की अंतिम सुनवाई में न्यायाधीश ने कहा कि जांच में यह पाया गया कि गंगा देवी ने कोर्ट की फीस 9 अप्रैल, 1977 को ही जमा करा दी थी। उन पर कुछ भी बकाया नहीं था। यह मामला फाइल में किसी गड़बड़ी के कारण चलता रहा। इसलिए इसका निस्तारण कर देना चाहिए। फैसला सुनाते वक्त गंगा देवी का कोई परिजन या रिश्तेदार वहां मौजूद नहीं था। उसके बाद न्यायालय ने फैसले की प्रति उनके एक पारिवारिक सदस्य को भेज दी है।

राष्ट्रपति भी जता चुके चिंता
सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर लोग कई टिप्पणियां कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि देश का न्यायिक तंत्र ऐसा नहीं होना चाहिए कि एक आम इंसान को मौत के बाद इंसाफ मिले। उल्लेखनीय है कि राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद भी देश की अदालतों में लंबित मामलों पर चिंता जता चुके हैं। एक कार्यक्र में उन्होंने कहा था कि अदालतों पर 3.3 करोड़ मुकदमों का भार है।

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  1. नमस्ते। मरनोपरांत न्याय मिला। उचित न्याय मिला। लेकिन अब किसको क्या मिला। न्यायालय की गलती का भुगतान कौन करेगा?

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