संसद की कार्यवाही बाधित न हो: विशेषज्ञ

नई दिल्ली। संसद और राज्य विधानसभाओं की कार्यवाही में लगातार व्यवधान के कारण बहुमूल्य समय और धन की बर्बादी पर चिंता व्यक्त करते हुए विशेषग्यों ने कहा है, कि सांसदों को सदन में विरोध व्यक्त करते समय स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगांठ पर लोकसभा में पारित उस सर्वसम्मत प्रस्ताव को ध्यान में रखना चाहिए, जिसमें कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने की प्रतिबध्दता व्यक्त की गई थी। राज्यसभा के मनोनीत सदस्य मणिशंकर अय्यर ने कहा कि लोकसभा में स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगांठ पर पारित प्रस्ताव में कहा गया था, कि अगर किसी मसले पर विरोध व्यक्त करना है तो वाकआउट का रास्ता अपनाया जा सकता है, लेकिन सदन की कार्यवाही में बाधा नहीं डाली जाएगी। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2011 में संसद के तीन सत्रों में 73 दिन बैठक हुई। इस अवधि में कामकाज के लिए निर्धारित 803 घंटों में 258 घंटे कई मुद्दों पर व्यवधान की भेंट चढ़ गए। लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप ने कहा कि स्वतंत्रता की 50वीं वर्षगांठ पर सर्वसम्मति से पारित इस प्रस्ताव में सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने की प्रतिबध्दता व्यक्त की गई थी। प्रस्ताव में कहा गया था, हम लोकसभा के सदस्य हमारे स्वतंत्रता सेनानियों की सेवाओं और महान बलिदान को कृतग्यता के साथ याद करते हैं, और संसद की प्रतिष्ठा के संरक्षण और इसे आगे बढ़ाने के लिए संयुक्त रूप से और सर्वसम्मति से प्रतिबध्दता व्यक्त करते हैं। सदस्यों ने नियमों का सम्मान करने और प्रक्रियाओं का पालन करने की प्रतिबध्दता व्यक्त की थी, और कहा था कि वह प्रश्नकाल के दौरान सदन के आधिकारिक क्षेत्र में नारेबाजी करने से बचेंगे। संवैधानिक मामलों की जानकार कल्पना राजारमन के अनुसार, आंध्रप्रदेश विधानसभा की सदन के कामकाज और प्रक्रिया से संबंधित नियमों की अनुसूची 5 में आचार संबंधी नियमों का उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है, कि जब सदन की कार्यवाही चल रही हो तब सदस्यों को आपस में बातचीत नहीं करनी चाहिए, लेकिन अगर बात करना अत्यंत जरूरी हो तब आवाज इतनी धीमी रखें कि कार्यवाही में कोई व्यवधान न हो। अगर अध्यक्ष के सदन में आने के बाद बोलने के लिए खड़े हों या व्यवस्था दे रहे हों, तब सदस्यों को अपने स्थान पर बैठ जाना चाहिए। नियमों के अनुसार कोई भी सदस्य अगर प्रश्न करना चाहते हों, तो उन्हें तब तक हाथ उठाना चाहिए जब तक अध्यक्ष का ध्यान उनकी ओर नहीं जाता। बिना अध्यक्ष की अनुमति के उन्हें नहीं बोलना चाहिए। चर्चा के दौरान किसी भी सदस्य को आपस में जिरह नहीं करनी चाहिए।

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Posted by on Apr 30 2012. Filed under राष्ट्रीय. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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