चन्द्रशेखर का गांव था सामाजिक आन्दोलन की प्रयोगशाला

बलिया। उत्तर प्रदेश में बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी गांव में 17 अप्रैल 1927 को जन्मे देश के आठवें प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के लिए उनका यह स्थान सामाजिक आंदोलन की प्रयोगशाला थी। समाजवाद के लिए संघर्ष के दौर में वह सैध्दांतिक प्रयोग अपने गांव में ही करते थे। उनके द्वारा किए गए प्रयोग गांव को आज भी याद है। गांव के विजय प्रताप सिंह उनके द्वारा किए गए प्रयोग से जुड़ी एक घटना का जिक्र करते हैं। वे बताते हैं कि गांव में पचईया हो रहा था। लड़के चीकई खेल रहे थे। सारा गांव पचईया के इस उत्सव को देख रहा था। दर्शकों में चंद्रशेखर भी शामिल थे। खेल रहे लड़कों में से अधिकांश के शरीर पर जनेऊ था। चंद्रशेखर अचानक खेल रहे लड़कों के बीच में पहुंच गए। उन्होंने लड़कों के शरीर पर पड़े जनेऊ को तोड़ दिया। सारा गांव अवाक था कि यह क्या हो गया। तभी चंद्रशेखर ने शिखा व सूत्र विहीन समाज की स्थापना का उद्धोष किया। विजय प्रताप सिंह बताते हैं कि इस घटना का गहरा असर चीकई खेल रहे लड़कों पर इतना पड़ा कि उन्होंने फिर जनेऊ को धारण नहीं किया। गांव के हरी शंकर सिंह भी सामाजिक आंदोलन के प्रयोग से जुड़ी एक घटना का जिक्र करते हैं। वह बताते है कि घर में शादी थी। चंद्रशेखर शादी में शामिल होने के लिए गांव पहुंचे थे। दरवाजे पर बारात को खाना खिलाया जा रहा था। आयोजन में पत्तल उठाने और साफ सफाई का जिम्मा गांव के कहार व कमतर बिरादरी का था। कई सेवक दरवाजे पर इस सेवा में मुस्तैद खड़े थे। पांत बैठी खाना खा रही थी। जैसे ही पांत उठी किसी ने पत्तल उठाने के लिए हांक लगायी। सेवक आगे बढे, लेकिन लोग यह देखकर हैरान रह गए कि चंद्रशेखर आगे बढे और स्वयं पत्तल उठाने लगे। उन्होंने कहा कि ये लोग ही पत्तल क्यों उठाएंगे हम क्यों नहीं। चंद्रशेखर को पत्तल उठाते देख कई युवक पत्तल उठाने के कार्य में लग गए। तबसे अब किसी भी प्रयोजन में गांव के लोग पत्तल उठाने के लिए कहार और कमतर जाति के लोगों का इंतजार नहीं करते।

Be Sociable, Share!

Short URL: http://www.dakshinbharat.com/?p=3886

Posted by on Apr 17 2012. Filed under प्रसंग. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

You must be logged in to post a comment Login

Powered by Givontech