राजनीति में अमिट छाप छोड़ गए डॉ. आचार्य

बेंगलूर । उडुपी में पिता विद्वान वेदांत शिरोमणि कट्टा श्रीनिवास आचार्य और माता कृष्णादेवी अम्मा के घर वर्ष 1939 में जन्मे वेदव्यास श्रीनिवास आचार्य ने वर्ष 1959 में केएमसी मणिपाल से चिकित्साशास्त्र की शिक्षा पूरी की। उन्हें दो बार सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी का पुरस्कार मिला। वर्ष 1968 में वे उडुपी नगर निगम द्वारा संचालित स्वर्ण जलापूर्ति प्रणाली के सबसे युवा उम्र के अध्यक्ष बने। उन्होंने इस स्थानीय निकाय में रहते हुए कई महत्वपूर्ण कार्य करवाए। उडुपी शहर के विकास और सौंदर्यीकरण में उनका योगदान काफी महत्वपूर्ण रहा। वे निगम अध्यक्ष के पद पर 8 वर्षों तक बने रहे। उन्होंने पूरे देश में पहली बार मानव मल की सफाई का काम किसी भी आदमी से करवाने के खिलाफ आवाज उठाई।
वर्ष 1974 से 1977 तक वे भारतीय जनसंघ के उडुपी जिलाध्यक्ष रहे। इसके बाद वर्ष 1980 तक जनता पार्टी के भी जिलाध्यक्ष बनाए गए। वर्ष 1980 में उन्हें भारतीय जनता पार्टी का जिलाध्यक्ष बनाया गया। इस पद पर वे तीन वर्षों तक बने रहे। वर्ष 1984 में उनके राजनीति करियर ने लंबी छलांग लगाई। उस वर्ष उन्हें भाजपा का प्रदेश उपाध्यक्ष और राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य बनाया गया। डॉ. आचार्य दो दशकों तक भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष पद पर बने रहे। इस दौरान उन्हें कार्यकारिणी सदस्य के रूप में भी कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं दी गईं। वर्ष 1975 से 1977 तक तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी द्वारा पूरे देश में लागू किए गए आपातकाल के दौरान उन्हें सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने के लिए विवादित कानून ‘मीसा’ के तहत 19 महीने जेल की सजा काटनी पड़ी। वर्ष 1983 में उन्होंने उडुपी से विधायक का चुनाव जीतकर विधानसौधा में कदम रखा। उन्होंने अपनी शालीनता और समर्पण के गुणों से विधानसभा में अपनी अलग पहचान बनाई। वर्ष 1996 में उन्हें कर्नाटक विधान परिषद की सदस्यता मिली। वर्ष 2002 में वे फिर से राज्य विधानमंडल के उच्चतर सदन के सदस्य चुने गए।
उन्होंने उडुपी को अलग जिले का स्वरूप देने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 2006 में उन्होंने चिकित्सा शिक्षा और पशुपालन मंत्री का कार्यभार संभाला। उन्होंने एक ही वर्ष में राज्य में छह नए मेडिकल कॉलेज खोल कर शानदार कार्य क्षमता का परिचय दिया। 12 नवंबर, 2007 में उन्होंने दोबारा मंत्रीपद की शपथ ली। वर्ष 2008 में उन्हें भाजपा की घोषणापत्र समिति के अध्यक्ष का पद सौंपा गया। 30 मई, 2009 को उन्होंने कर्नाटक के गृह मंत्री के रूप में कैबिनेट मंत्री का दर्जा हासिल किया। वर्ष 2009 में उन्हें धर्मादाय विभाग का अतिरिक्त कार्यभार मिला। इन पदों पर रहते हुए डॉ. आचार्य ने पुलिस और अन्य बलों के आधुनिकीकरण के कार्य में काफी दिलचस्पी ली। उनके ही निर्देश पर राज्य में आतंक विरोध बल का गठन किया गया। उन्होंने कर्नाटक के व्यापक समुद्रतटीय क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए तटरक्षक बलों को अधिक सशक्त बनाने की जरूरत महसूस की। इस दिशा में उन्होंने काफी काम भी किया।
राज्य में कानून-व्यवस्था को नियंत्रित रखने के लिए अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की जरूरत को देखते हुए उन्होंने पुलिस नियुक्ति प्रक्रिया को नए सिरे से ढाला था। पुलिसकर्मियों की सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए उनके वेतन-भत्तों और उनकी छुट्टियों से संबंधित नीतियों में आवश्यक सुधार लाना उनकी खास उपलब्धि थी। काम के मामले में हमेशा दो कदम आगे रहने के लिए जाने जाते रहे डॉ. आचार्य ने वर्ष 2010 में उच्चतर शिक्षा, सांख्यिकी और योजना मंत्री के रूप में भी कर्नाटक के विकास की दृष्टि को आगे बढ़ाने में सक्रियता बरती।

Be Sociable, Share!

Short URL: http://www.dakshinbharat.com/?p=3048

Posted by on Feb 15 2012. Filed under मुख्य सुर्खियाँ. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

You must be logged in to post a comment Login

Powered by Givontech