भ्रष्टाचार से मुक्ति का पर्व ओणम

के.जी. बालकृष्ण पिल्लै
केरल में तिरूओणम का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। सरकारी कार्यालयों के लिए इन चार दिनों की छुट्टी रहती है। विद्यालयों को करीब दस दिनों की छुट्टी दी जाती है। इसी दौरान केरल सरकार की ओर से पर्यटक सप्ताह भी मनाया जाता है।
गांवों और शहरों में यह पर्व बड़े उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है। बालक, वृध्द, स्त्री-पुरुष परंपरागत ढंग के रंग-बिरंगे नए-नए कपड़े पहनकर तरह-तरह के मनोविनोदों में मौज उड़ाते हैं। गरीबों के परिवारों में भी तरह-तरह के विशेष भोजन पकाए जाते हैं। गांवों में लोकगीत, लोकनृत्य आदि की गूंज सुनाई देती है। कन्याएं झूलों पर झूलती हैं। बालक और युवक तरह-तरह के खेल खेलते हैं। नदियों और झीलों मे नौका दौड़ की प्रतियोगिताएं चलती हैं। शहरों में विविध सरकारी तथा गैरसरकारी संगठनों के तत्वावधान में तरह-तरह की क्रीड़ा, कला प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। सड़कें बिजली की रंग-बिरंगी बत्तियों से अलंकृत की जाती हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन पर अनेक विशेष कार्यक्रम होते हैं।
वैसे केरल के बाहर भी जहां मलयालम भाषा-भाषी लोग बस गए हैं, वहां भी ओणम का पर्व मनाया जाता है। तो भी प्रवासी मलयाली ओणम के दिन अपने-अपने परिवारजनों, बंधुओं और मित्रों के साथ बिताने की इच्छा से केरल लौट आने की कोशिश करते हैं। इन दिनों यातायात की विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। विशेष रेलगाड़ियां विशेष बस सर्विस आदि। ओणम के पर्व के पीछे एक रोचक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। कथा श्रीमद्भागवत की है। वामनावतार की कथा। पृथ्वी पर महाबलि नाम के एक असुर राजा शासन करते थे। उनका शासन हर प्रकार के भ्रष्टाचार से इतना मुक्त था कि मानव, मानव में संपूर्ण समता कायम थी।
असत्य या हिंसा का कहीं नामोनिशान भी नहीं था। न काला धन, न काला बाजार, न रिश्वतखोरी। राजा-रंक का भेद नहीं, शिशु-मरण नहीं, कोई रोग भी नहीं, गरीबी की रेखा के नीचे कोई नहीं, कोई बेकार नहीं। इस संबंध में एक लोकगीत प्रचलित है-
मावेलि नाट वाजीटम कालम मानुषर एल्लारूम ओन्नु पोले। यानी जब मावेलि (महाबलि) शासन करते रहे, तब सभी मानव समान थे। कहीं आर्थिक विषमता नहीं। कहीं धोखाधड़ी नहीं। कहीं झूठ-प्रपंच नहीं।
राजा महाबलि का यश जब तीनों लोकाें में फैला तब इंद्र को यह चिंता हुई कि कहीं उसका सिंहासन महाबलि हड़प न ले। उसने भगवान विष्णु से निवेदन किया कि महाबलि को किसी न किसी प्रकार पदच्युत किया जाए। भगवान विष्णु ने वामन का (एक ब्राह्मण) बालक का रूपधारण किया और महाबलि के पास आकर तीन कदम जमीन मांगी, बैठकर तपस्या करने के लिए।
महाबलि तो बड़े उदार थे। यह प्रार्थना कैसे ठुकराते, उन्होंने कहा- आप ही तीन कदम जमीन नाप लें। क्षणभर में वामन ने विशाल रूप धारण कर लिया। दो कदम में तीनों लोक नाप लिए। तीसरा कदम कहां रखें? महाबलि ने अपना सिर झुका दिया। वामन ने उस पर तीसरा कदम रखा और महाबलि को पाताल भेज दिया। इस वक्त महाबलि ने एक वर मांगा। साल में एक बार मैं अपनी प्रजा को देखने के लिए भू-तल पर आना चाहूंगा। मैं यह सुनिश्चित करना चाहूंगा कि मेरा देश सर्वथा भ्रष्टाचार मुक्त है, प्रजा सर्व प्रकारेण सुखी है, सानन्द है, कहीं कोई आर्थिक विषमता नहीं, सर्वत्र समता बनी हुई है। तब महाविष्णु ने कहा- तथास्तु।
इसी वरदान के फलस्वरूप प्रतिवर्ष ओणम के दिनों में राजा महाबलि अपनी प्रजा को सुखी और संतुष्ट देखकर आश्वस्त होने के लिए पृथ्वी तल पर आया करते हैं। उनके स्वागत में ही केरल में ओणम का पर्व मनाया जाता है। इसकी यह विशेषता है कि यद्यपि उक्त कथा हिन्दू पुराण से संबंधित है तो भी केरल के सभी धर्म व जातियों के लोग ओणम का त्यौहार मनाने में एकजुट हो जाते हैं। यह समता का त्यौहार है। भ्रष्टाचार मुक्ति का त्यौहार है। यह त्यौहार लोगों में यह विश्वास दृढ़ कर देता है कि समाज की आर्थिक विषमता अवश्य मिटाई जा सकती है, यदि भ्रष्टाचार मिटाया जा सके तो।
(विनायक फीचर्स)

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Posted by on Sep 9 2011. Filed under आस्था. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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