atal bihari vajpayee
atal bihari vajpayee

पढ़े लिखे लोगों को लिखित दस्तावेजों पर अधिक विश्वास रहता है। एक बार किसी व्यक्ति ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी से कहा कि वे कभी उनके पास अपना संविधान भेजें, देखते हैं क्या करता है आपका संघ। डॉक्टर साहिब ने दोपहर को एक युवा स्वयंसेवक भेज दिया। उस व्यक्ति ने समझा यह संविधान लेकर आया होगा, उसने चाय-पानी पूछने का शिष्टाचार दिखाया और कुछ देर बाद पूछा कि क्या डॉक्टर साहिब ने कुछ भेजा है। युवक ने कहा नहीं। कुछ देर बैठ कर युवक अपने घर लौट आया।

अगले दिन जब डॉक्टर साहिब मिले तो इस व्यक्ति ने कहा शिकायती लहजे में कहा कि आपने संविधान भेजा नहीं। इस पर हेडगेवार जी बोले, जिस युवक को आपके पास भेजा था वह अपने आप में संविधान ही था, एक जीवंत संविधान, जिसके जीवन का एक-एक पहलु संघ का जीता जागता दस्तावेज है। उन्होंने कहा संघ को पढ़-सुन या चर्चा करके नहीं, स्वयंसेवकों के जीवन को देख कर समझा जा सकता है। इसी उदाहरण को हिंदुत्व के धरातल पर उतारा जाए तो दिवंगत नेता अटल बिहारी वाजपेयी को हिंदुत्व के विश्वकोष की प्रस्तावना कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। वाजपेयी जी का जीवन हिंदुत्व को देखने का झरोखा है जिसमें झांक कर उस विराट जीवंत सिद्धांत के दर्शन किए जा सकते हैं।

अटलजी के श्रीमुख से निकली कविता- रग रग हिंदू मेरा परिचय, मानो उनकी आत्मकथा और हिंदुत्व का सारांश है। इस कविता का एक-एक गद्यांश वाजयेपयी जी के जीवन पर अक्षरश: स्टीक बैठता और हिंदुत्व को परिभाषित करता दिखता है। कविता के आरंभ में वे लिखते हैं-

मैं शंकर का वह क्रोधानल,
कर सकता जगती क्षार क्षार।
डमरू की वह प्रलयध्वनि हूं,
जिसमें नचता भीषण संहार।

कारगिल युद्ध साक्षी है कि वाजपेयी ने शंकर जी का डमरू बन कर पाकिस्तानी सेना में प्रलयध्वनि फैला दी। सौम्य स्वभाव के वाजपेयी ने इस युद्ध के दौरान गजब का साहस व नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन किया। जब पाकिस्तानी सैनिकों से भारतीय सैनिक लोहा ले रहे थे तो अमेरिका सहित अनेक देशों का दबाव था कि भारत शांति का मार्ग अपनाए परंतु वाजपेयी जी ने किसी की न सुनी। पाकिस्तान ने वाजपेयी से बातचीत की पेशकश की लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया कहा कि जब तक पाक सेना वापस नहीं जाएगी, तब तक कोई बातचीत नहीं होगी।

भारत ने दो महीने में यह युद्ध जीता था और पाकिस्तानी सैनिकों को भागने पर मजबूर कर दिया। हिंदुत्व में वीरता व शौर्य को मानव का नैसर्गिक गुण स्वीकार किया गया है जिसके बिना सुरक्षित, संयत जीवन व विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हिंदुत्व के आदर्श भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण व गुरु गोबिंद सिंह जी जैसे असंख्यों वीरों ने दुनिया को समय-समय पर भारतीय शौर्य का लोहा मनवाया। मर्यादा व वीरता के प्रतीक भगवान श्रीराम कहते हैं- भय बिनु होय न प्रीत अर्थात दुष्ट व्यक्ति को जब तक दंडित नहीं किया जाता तब तक वह सही मार्ग पर नहीं आता। श्रीकृष्ण ने दुष्ट शिशुपाल के सौ अवगुण माफ किए परंतु सीमा लांघने पर उसे दंडित भी किया। धर्म की स्थापना के लिए उन्होंने कुरुक्षेत्र का मार्ग चुना। इसी तरह गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिखों को संदेश दिया कि- न डरों अरि सो जब जाइ लरों निसचै करि अपुनी जीत करों

एक पंक्ति में अटल जी लिखते हैं कि –

मैं अखिल विश्व का गुरु महान,
देता विद्या का अमर दान।
मैंने दिखलाया मुक्तिमार्ग,
मैंने सिखलाया ब्रह्म ज्ञान।

वेद मानव सभ्यता के सबसे प्राचीन और लिखित दस्तावेज हैं। हिन्दुत्व के आदर्श विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं। ये वेद ही हैं जिनके आधार पर अन्य धार्मिक मान्यताओं और विचारधाराओं का आरंभ और विकास हुआ है। वेद में लिखे गए मंत्र जिन्हें ऋचाएँ कहा जाता है, कहा जाता है कि इनका इस्तेमाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके लिखे जाने के समय था। ज्ञान, विज्ञान, अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र, समाज शास्त्र अर्थात् मानव जीवन के सभी अंगों से सरोकार रखने वाले हैं वेद जो जितने प्राचीन हैं उतने नित्य नूतन भी। दुनिया के बड़े हिस्से में जिस युग में अज्ञानता का अंधकार छाया था भारत में ज्ञान-विज्ञान का डंका बजता था। दुनिया के विभिन्न हिस्सों से जिज्ञासु भारत आकर अपनी ज्ञान पिपासा शांत करते और दुनिया के अन्य हिस्सों में प्रकाश फैलाते रहे हैं।

जगती का रच करके विनाश,
कब चाहा है निज का विकास।
शरणागत की रक्षा की है,
मैंने अपना जीवन देकर।

यज्ञ के दौरान राजा शिबि की जाँघ पर एक डरा-सहमा कबूतर आकर बैठ गया। बोला- राजन, मैं आपकी शरण में हूँ। मेरे पीछे पड़े शत्रु से मेरी रक्षा कीजिए। तभी एक बाज वहाँ आकर बोला- महाराज, यह मेरा शिकार है। इसे मुझे सौंप दें। शिबि- नहीं, इस कमजोर प्राणी की रक्षा करना मेरा धर्म है। बाज- तो फिर मैं भी आपकी शरण में हूँ और बहुत भूखा हूँ। यदि मैंने कुछ नहीं खाया तो मर जाऊँगा और तब मेरी पत्नी और बच्चे अनाथ हो जाएंगे। शिबि- भले ही मेरा राजपाट चला जाए, लेकिन मैं इसे तुम्हें नहीं सौंपूंगा। बाज बोला- तो ठीक है आप इसके वजन के बराबर मांस अपनी जांघ से काट कर दे दें। शिबि ने तुरंत एक तराजू मँगाया और उसके एक पलड़े में कबूतर को बैठाकर दूसरे में अपनी जाँघ का मांस काटकर रख दिया। लेकिन तराजू जरा भी नहीं हिला। इसके बाद शिबि अपने शरीर के अन्य अंगों से मांस काटकर तराजू पर रखते गए, लेकिन तब भी पलड़ा नहीं हिला तो वे खुद उस में बैठ गए। यही है हिंदुत्व की भावना जो शरणागत के जीवन की रक्षा और उसके लिए बलिदान करने का पाठ पढ़ाता है।

मुझको मानव में भेद नहीं,
मेरा अन्त:स्थल वर विशाल।

जग से ठुकराए लोगों को,
लो मेरे घर का खुला द्वार।

मेरा हीरा पाकर ज्योतित,
परकीयोंका वह राज मुकुट।

आज से 2985 वर्ष पूर्व अर्थात 973 ईसा पूर्व में यहूदियों ने केरल के मालाबार तट पर प्रवेश किया। यहूदियों के पैगंबर थे मूसा, लेकिन उस दौर में उनका प्रमुख राजा था सोलोमन, जिसे सुलेमान भी कहते हैं। नरेश सोलोमन का व्यापारी बेड़ा मसालों और प्रसिद्ध खजाने के लिए आया। आतिथ्य प्रिय हिन्दू राजा ने यहूदी नेता जोसेफ रब्बन को उपाधि और जागीर प्रदान की। यहूदी कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्य में बस गए। विद्वानों के अनुसार 586 ईसा पूर्व में जूडिया की बेबीलोन विजय के तत्काल पश्चात कुछ यहूदी सर्वप्रथम क्रेंगनोर में बसे। दुनिया में जब यहूदियों पर अत्याचारों का क्रम शुरू हुआ और किसी देश ने उन्हें शरण नहीं दी तो भारत ने उन्हें यहां ससम्मान बसने का अवसर दिया।

केवल इतना ही नहीं उन्हें अपने विश्वास के अनुसार धर्म का पालन करने, समानता, स्वतंत्रता का अधिकार दिया। केवल यहूदी ही नहीं बंजारों सा जीवन व्यतीत करने वाले शक, हुण, कुषाण भी इसी धरती पर रच बस गए और भारतीय समाज ने इन्हें अपने साथ आत्मसात किया। इस तरह की उदाहरण दुनिया के अन्य हिस्सों में अपवादस्वरूप ही देखने को मिल सकता हैं। यह हमारे वैभव का ही प्रतीक है कि कथित ग्रेट ब्रिटेन की महारानी के मुकुट पर लगा कोहेनूर हीरा हम भारतीयों का ही है जिसे अंग्रेज अंतिम सिख सम्राट महाराजा रणजीत सिंह के पुत्र से धोखे से छीन कर ले गए।

गोपाल राम के नामों पर,
कब मैंने अत्याचार किया।

कब दुनिया को हिन्दू करने,
घर घर में नरसंहार किया।

भू-भाग नहीं शत शत मानव,
के हृदय जीतने का निश्चय।

धर्म मानव को सभी तरह के बंधन से मुक्त करता है परंतु दुनिया का इतिहास बताता है कि कुछ संप्रदायों ने अपने विश्वास को ढाल बना कर दुनिया को बंधनयुक्त करने का प्रयास किया। कोई मत तलवार की धार से फैला तो कोई लालच और प्रलोभन के बल पर। दोनों ने ही मानवता पर अगणित अत्याचार किए। इन मतों की मतांधता से इतिहास के पन्ने खून से लथपथ हो गए परंतु किसी हिंदू सम्राट ने दुनिया को हिंदू करने के लिए किसी तरह का अत्याचार नहीं किया। हिंदू शासक तो विदेशों से आने वाले धर्मगुरुओं का सदैव स्वागत व उन्हें प्रोत्साहन देते रहे।

भारत ने कभी नहीं चाहा कि दुनिया उसकी गुलाम हो बल्कि हिंदुत्व सिखाता है कि अपने मन को कैसे गुलाम किया जाए, कैसे जीता जाए। गुरु नानक देवजी कहते हैं- मन जीते जग जीत अर्थात जिसने मन को जीत लिया उसने दुनिया पर विजाय पा ली। हर मत व हर विश्वास का सम्मान, अपनी आस्था पर अडिगता यही हिंदुत्व का सिद्धांत है जो वाजपेयी जी के जीवन में गहराई तक उतरा हुआ था। उन्होंने निज धर्म पर राष्ट्र धर्म को अधिमान दिया। उनके दरवाजे सभी धर्मों व मतों के लिए खुले रहे। स्थान की मर्यादा को ध्यान में रख कर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि किसी ने हिंदुत्व का जीवंत उदाहरण देखना हो तो वह वाजपेयी जी के जीवन को देख सकता है।

– राकेश सैन –
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

(साभार: प्रभा साक्षी)

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