हर परिस्थिति में जो सम रहे, वह है योगी: ऋषिमुनिजी

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बेंगलूरु/दक्षिण भारत। वर्द्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ चिकपेट शाखा के तत्वावधान में यहां गोड़वाड़ भवन में उपाध्यायश्री रवींद्रमुनिजी ने शुक्रवार को मंगलाचरण से धर्मसभा की शुरुआत की। इस मौके पर दिगम्बर संतश्री तरुणसागरजी के दिवंगत होने पर उन्हें श्रद्धा से याद करते हुए उनका गुणगान किया। इस अवसर पर ऋषि मुनिजी ने भगवान कृष्ण के जीवन को विस्तार से उल्लेखित करते हुए एक भजन प्रस्तुत किया।

मुनिश्री ने कहा कि भगवान महावीर की वाणी व भगवान कृष्ण का जीवनदर्शन अनुकरणीय है। महावीर के सूत्र और भगवान श्रीकृष्ण के जीवन दर्शन को विस्तार से उल्लेखित करते हुए ऋषिमुनिजी ने कहा कि लाभ में मद नहीं करना चाहिए और हानि में शोक नहीं करना चाहिए । लाभ और हानि तो सहज प्रक्रिया है जीवन की। जो व्यक्ति लाभ-हानि, अनुकूलता व प्रतिकूलता में अपने मन को स्थिर व सम रखता है उसे जीवन में शांति व संतोष की प्राप्ति होती है।

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जीवन के समता भाव को टिकाए रखने की सीख देते हुए ऋषिमुनिजी ने कहा कि जीवन में कितनी भी विपरीत परिस्थितियां या प्रतिकूलताएं आ जाएं, प्रसन्नता को नहीं त्यागना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण का उदाहरण देते हुए मुनिश्री ने कहा कि युद्ध के मैदान में भी प्रभु के चेहरे पर मुस्कान ही रहती थी। प्रभु श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में सब कुछ यानी अच्छा-बुरा, मीठा-कड़वा, वरदान-श्राप आदि परिस्थितियों को एक भाव से अपनाया। अपनी आत्मा को छोड़कर विषयों का चिंतन करने वाला योगी नहीं भोगी होता है। जो हर परिस्थिति में सम रहे वह योगी।

उन्होंने कहा, जीवन में छोटी-छोटी गलतियों को भूलने की सामर्थ्य पाने की प्रेरणा देते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में ऐसा साहस प्राप्त करना चाहिए कि आप संसार के जीवो की गलतियों को माफ कर सकें। इससे पूर्व अर्हममुनिजी ने गीतिका सुनाई। धर्मसभा में उपप्रवर्तकश्री पारसमुनिजी ने मांगलिक प्रदान की। चिकपेट शाखा के महामंत्री गौतमचंद धारीवाल ने संचालन किया। धारीवाल ने बताया कि शनिवार को चौमुखी जाप के लाभार्थी प्रकाशचंद सुशीलकुमार बाफना का रवींद्रमुनिजी ने जैन दुपट्टा ओढ़ाकर सम्मान किया।

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