गीदड़ भभकियों से नहीं डरता दक्षिण भारत राष्ट्रमत

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  • मदनलाल गोटावत के बेटे ने दक्षिण भारत को दिया कानूनी नोटिस
  • सुनीलकुमार गोटावत से कानूनी लड़ाई लड़ेगा अखबार, हमने दिया नोटिस का जवाब
  • मदनलाल गोटावत और उनकी पत्नी को अस्थायी आसरा देने वाले गोड़वाड़ भवन को भी दिया नोटिस
  • दक्षिण भारत राष्ट्रमत में समाचार छपने  के बाद बेटे सुनील ने खाली किया घर
  • भविष्य में भी सामाजिक सरोकार के ऐसे मामले को और जोर से उठाएंगे हम

जो व्यक्ति पांच दिन तक अपने माता-पिता की खोज खबर लेने की जहमत भी न उठाए कि वे आखिर हैं कहां और यदि नहीं पता चल रहा तो पुलिस स्टेशन में गुमशुदगी की रिपोर्ट भी न लिखाए वह हमें मानहानि का नोटिस भिजवा रहा है। कैसी विडम्बना है कि किसी जमाने में करा़ेड़ों रुपए कमाने वाले व्यक्ति को एक संगठन के भवन में आकर आसरा लेना पड़ा और अपना दुख उजागर करना पड़ा। 

गत 18 जुलाई को प्रकाशित समाचार

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। आपने दक्षिण भारत राष्ट्रमत के 18 जुलाई 2018 के अंक में 86 वर्षीय मदनलाल गोटावत और उनकी 84वर्षीय धर्मपत्नी पिस्ताबाई गोटावत की दक्षिण भारत अखबार के सामने व्यक्त की गई दास्तान का समाचार पढ़ा होगा। लालबाग रोड क्रॉस स्थित गोड़वाड़ भवन में यह वृद्ध दम्पति रह रहा था जब हमने उनसे बातचीत की। मदनलाल गोटावत लकवे की चपेट के कारण चलने फिरने की स्थिति में नहीं थे और उनकी धर्मपत्नी पिस्ताबाई ने अपने छोटे बेटे सुनील कुमार द्वारा उन्हें दी जाने वाली प्रताड़ना के बारे में अखबार को बताया और हमने वह दास्तान छापी ताकि समाज को, कुछ बड़े बड़े घरों की चार दीवारी के भीतर क्या होता है इसके बारे में पता लग सके। दक्षिण भारत ने वही लिखा जो पिस्ताबाई ने बताया। इस संबंध में इस दम्पति के छोटे बेटे सुनील कुमार ने अखबार को कानूनी नोटिस भेजा है और हमने उसका कानूनी जवाब दे दिया है। हमने अपने अधिकार का उपयोग किया और भविष्य में भी ऐसे मामलों में सामाजिक जागरूकता और सर्वजन हित के लिए और अधिक दृढ़ता के साथ रिपोर्टिंग करेंगे यह संकल्प व्यक्त करते हैं। दक्षिण भारत कभी भी गीदड़ भभकियों से डरता नहीं।

इसे भी देखें :  करोड़ों की संपत्ति कमाने के बावजूद बेघर हुए 86 वर्षीय मदनलाल गोटावत

’दक्षिण भारत’ में समाचार प्रकाशन का असर यह हुआ कि सुनीलकुमार जैन ने अपने माता-पिता का घर खाली कर दिया जबकि इसके पूर्व उनके सभी प्रयासों के बावजूद खाली नहीं कर रहे थे। जो व्यक्ति पांच दिन तक अपने माता-पिता की खोज खबर लेने की जहमत भी न उठाए कि वे आखिर हैं कहां और यदि नहीं पता चल रहा तो पुलिस स्टेशन में गुमशुदगी की रिपोर्ट भी न लिखाए वह हमें मानहानि का नोटिस भिजवा रहा है। कैसी विडम्बना है कि किसी जमाने में करा़ेड़ों रुपए कमाने वाले व्यक्ति को एक संगठन के भवन में आकर आसरा लेना पड़ा और अपना दुख उजागर करना पड़ा। कोई भी मां मरते दम तक अपनी औलाद का बुरा नहीं चाहती और पीड़ा सहकर भी किसी को नहीं कहती परन्तु जब पानी सिर के ऊपर से निकल जाए तब उसे समाज के लोगों तक अपनी बात पहुंचानी होती है। यह तो भला हो, गोड़वाड़ भवन ट्रस्ट के ट्रस्टियों और पदाधिकारियों का कि उन्होंने समाज के, ऐसी स्थिति में पहुंचे किसी भी भाई-बहन के लिए गोड़वाड़ भवन के द्वार खुले रखे हैं अन्यथा बेघर हुआ व्यक्ति कहां जाए? भवन ट्रस्ट के मंत्री कुमारपाल सिसोदिया ने गोटावत दम्पति को भवन में रहने की व्यवस्था की तो उन्हें भी सुनीलकुमार ने कानूनी नोटिस थमा दिया और पता चला है कि सभी ट्रस्टियों को भी शायद नोटिस दिया गया है। इतना ही नहीं, सुनील ने अपने माता पिता को भी नोटिस दिया है। समाज को इस प्रकार की मानसिकता को पहचानने और ऐसे लोगों की संकीर्ण सोच को समझने की जरुरत है कि ऐसे लोगों से कैसा सलूक किया जाए?

जहां तक दक्षिण भारत का सवाल है, समाज हित में हम किसी भी सामाजिक मुद्दे पर कभी किसी दबाव या लालच में नहीं आते। पूरा समाज इस बात को जानता है। दक्षिण भारत की निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकारिता के बारे में कुछ भी कहने की जरुरत नहीं, एक एक पाठक इसका गवाह है। भविष्य में हम ऐसे मुद्दों को और ज्यादा ताकत के साथ उठाने के लिए कटिबद्ध हैं।

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  1. नमस्ते। सही संपादक ही सही रिपोर्ट लिखते हैं। आप का समाचार पत्र सामाजिक कुरीतियों को सुधारने के लिए सतत प्रयास करता आ रहा है। करते रहे। धन्यवाद।

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