चेन्नई। शहर के एक स्कूल परिसर में सेप्टिक टैंक में पांच वर्षीय ल़डके की डूबकर मौत होने के बाद एक बार फिर से स्कूली शिक्षा निदेशालय द्वारा स्कूलों के लिए तैयार सुरक्षा दिशा निर्देशों और नियमों को लागू करने के बारे में सवाल उठने शुरु हो गए हैं। इस घटना के बाद ऐसा कहा जा रहा है कि स्कूलों में लागू किए जाने के लिए तैयार किए गए सुरक्षा दिशा निर्देश सिर्फ कागजों और स्कूलों के नोटिस बोर्ड पर चिपकाए जाने तक सीमित हैं। ्यद्मद्भद्बह्र ·र्ष्ठैं झ्य्ध्द्म झ्द्य द्मब्र्‍्र द्यक्वर्‍ ज्य्त्रर्‍ द्मज्द्यस्कूली शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार सरकार समय-समय पर स्कूलों को नोटिस भेजती है और उन्हें सुरक्षा संबंधी नियमों का पालन करने का निर्देश देती है लेकिन इस बात नजर नहीं रखी जा रही है कि स्कूलों द्वारा इन सुरक्षा निर्देशों का पालन किया जा रहा है या नहीं। स्कूलों के लिए समय-समय पर सुरक्षा के बारे में जागरुकता कार्यक्रमों का आयोजन करना भी जरुरी है लेकिन अधिकांश स्कूलों द्वारा इसका पालन नहीं किया जाता। जब तक किसी स्कूल परिसर में कोई दुर्घटना नहीं घटती सुरक्षा संबंधी नियमों की ओर किसी का ध्यान नहीं दिया जाता।फ्ैंझ्त्र ृय्द्भह्ख् द्मष्ठ त्रस्द्भय्द्य ्य·र्ैंॅ त्र्ष्ठ ्यख्रप्रय्य् ्यद्मख्रश्चष्ठप्रय्कंुभकोणम में एक स्कूल में लगी आग के बाद ९० बच्चों की मौत होने के बाद राज्य के सभी सरकारी और निजी स्कूलों के लिए सुरक्षा दिशा निर्देश और सुरक्षा नियम तैयार किए गए थे। इस दुर्घटना के बाद से लगातार इन दिशा निर्देशों और नियमों में संशोधन कर इसमें सुधार भी किया जा रहा है। न्यायाधीश के संपत आयोग द्वारा स्कूलों के परिसर में सुरक्षा बनाए रखने के बारे में पेश की गई रिपोर्ट में स्कूलों की छत, परिवहन और स्कूल बसों द्वारा अपनाए जाने वाले सुरक्षा उपायों सहित विभिन्न पहलुओं पर दिशानिर्देश जारी किए थे जिनका सभी स्कूलों द्वारा पालन किया जाना चाहिए।्यप्रय्ूय्य् ्यप्द्नय्ख् ·र्ैंय् द्मह्यट्टफ् द्नरूध् ज्य्त्रष्ठ ब्स्र ड·र्रूैंध् पिछले वर्ष बा़ढ और वर्धा चक्रवात के बाद, शिक्षा विभाग ने जल निकायों (जल निकासी, खुली राशि) और विद्युत स्विचबोर्ड के संबंध में सुरक्षा उपायों के संबंध में स्कूलों को बार-बार नोटिस भेजे गए। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि स्कूलों को यह नोटिस मिलते हैं और वह इसे लागू करने बजाय इसे प्राप्त कर यह तक भूल जाते हैं कि उन्हें इस प्रकार का कोई नोटिस भी प्राप्त हुआ था। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि स्कूल प्रबंधनों की नींद अक्सर तब टूटती है जब किसी विद्यार्थी की मौत हो जाती है।·र्ैंंश्च र्ज्ङैंद्यर्‍ झ्ब्ध्रुृह्र झ्द्य द्नर्‍ द्मब्र्‍्र ब्ह्त्रय् क्द्भय्द्मस्कूलों में बेहतर सुविधा उपलब्ध करवाने और स्कूली बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कार्य करने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं के कार्यकर्ताओं के अनुसार अधिकांश स्कूलों का ध्यान इस बात पर नहीं होता कि उनकी स्कूल बसें सही जगह पर पार्क है या नहीं या उनके स्कूल के स्विमिंग पुल पर बा़ड लगी है या नहीं या फिर स्कूल के सुनसान गलियारे में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं या नहीं। मौजूदा समय की जरुरत है कि स्कूल इसे एक अभियान के रूप में लें। चाहे स्कूल निजी तौर पर या स्कूल संघों द्वारा यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उनका परिसर विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित है। ·र्स्ैंफ्ष्ठ ·र्ैंद्यय्द्भय् ज्य् फ्·र्ैंत्रय् ब्स् ंद्म ्यद्मद्भद्बह्र ·र्ैंय् झ्य्ध्द्म निजी स्कूलों के एसोसिएशन सदस्यों के अनुसार स्कूल प्रबंधन को अपने शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों को नियमित रूप से सुरक्षा पहलुओं के बारे में बताया जाना चाहिए। आम तौर पर स्कूलों की वार्षिक बैठक के दौरान सिर्फ विद्यार्थियों के प्रदर्शन के बारे में चर्चा होती है और सुरक्षा उपायों को लागू करने के बारे में कोई चर्चा नहीं की जाती। इसके साथ ही सरकार भी इस बारे में उदासीन है। सरकार की ओर से भी निजी स्कूलों के शैक्षणिक और गैर शैक्षणिक कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने के लिए कोई कार्यक्रम संचालित नहीं किया जाता।

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