यह मसू़ढों का रोग है। यह मसू़ढों तथा दांतों पर मैल की परत जमने से शुरू होता है। मसू़ढों पर जमी यह परत धीरे-धीरे सख्त हो कर पत्थर जैसी बन जाती है। ऐसे मसू़ढे सूज जाते हैं और उनमें खून तथा मवाद भर जाते हैं और उनमें से खून तथा मवाद आने लगता हैं। मुंह से दुर्गन्ध आती है। यदि समय रहते इसका इलाज न हो तो दांतों के आसपास की हड्डी गलने लगती है। इससे दांत हिलने लगते हैं और गिर जाते हैं।उपचार : यह रोग की अवस्था पर निर्भर करता है। आरंभिक अवस्था में मसू़ढों और दांतों की साफ-सफाई से ही आराम आ जाता है। इसके अलावा डैंटल सर्जन मसू़ढों के नीचे एंटीसैप्टिक सोल्यूशन की धार के्द्रिरत कर भीतर जमें रोगाणुओं का सफाया भी कर सकते हैं। दांतों के ऊपरी छोर की सतह यदि असमतल हो गई हो तो उसे भी समतल बनाया जाता है ताकि रोगणुओं का अड्डा न बन सके किन्तु स्थिति अधिक बिग़ड चुकी हो तो एंटीबायोटिक शुरू कर नीचे की हड्डी की सफाई और सुधार किए बिना बात नहीं बनती।की़डा लगना : दांत में की़डा मुंह की साफ-सफाई के प्रति लापरवाही से लगता है। दांतों पर चिपके भोजन के कणों से लैक्टोबेंसिलस नामक बैक्टीरिया पैदा होते हैं और उनके प्रभाव से मुंह के भीतर तेजाब बन जाता है। यह तेजाब दांतों में सुराख कर देता है। इससे दांत के भीतर की अतिसंवेदनशील नसें नग्न हो जाती हैं और दांत में दर्द होने लगता है।उपचार : दांत में लगे की़डे के इलाज के लिए एक तरफ एंटीबायोटिक और दूसरी तरफ सूजन एवं दर्द दूर करने वाली दवा लेने की जरूरत होती है। दांत अधिक गला न हो तो उसकी भीतर से पूरी सफाई यानी रूट कनाल करके भराई की जाती है। दांत बच जाए तो फिर से उसे मजबूत बनाने के लिए उसके ऊपर पोर्सलीन का लेप या डैंटल क्राऊन च़ढा दिया जाता है।

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