acharya mahashraman ji pravachan
acharya mahashraman ji pravachan

चेन्नई/दक्षिण भारत। शहर के माधावरम स्थित तेरापंथ नगर में महाश्रमण समवसरण में चातुर्मार्थ विराजित आचार्यश्री महाश्रमणजी ने गुरुवार को ठाणं आगमाधारित अपने प्रवचन में कहा कि ज्ञान अपने आप में पवित्र होता है। भूगोल, खगोल, गणित, भौतिक, रासायनिक आदि-आदि अनेक ज्ञान होते हैं। अध्यात्म को जानना भी ज्ञान होता है।

सरल शब्दों में कहें तो ज्ञान अनंत है। पूर्व में जब सर्वज्ञ हुआ करते थे तो ग्रंथों का कोई महत्त्व नहीं था। कितने-कितने ज्ञान उन्हें कंठस्थ रहते थे। सर्वज्ञों की अनुपस्थिति में इन ग्रंथों का महत्त्व अत्यधिक बढ़ जाता है। ग्यारह आगमों में जितना ज्ञान समाहित है, वह भी मानो अधूरा है।

आचार्यश्री ने कहा कि भगवान महावीर के निर्वाण के बाद ज्ञान को एकत्रित करने और उसे लिपिबद्ध करने का प्रयास किया गया। इस क्रम में करीब 500 साधु भद्रबाहुस्वामी से 14 पूर्वों का ज्ञान लेने के लिए गए थे, किन्तु ज्ञान की विकटता और वर्षों लगने वाले समय से श्रद्धालु ऊबते गए और वह ज्ञान छोड़ वापस लौट आए।

एकमात्र संतश्री स्थूलीभद्र ने दस पूर्वों का ज्ञानार्जन किया और बाद में उन्होंने ज्ञान का गलत प्रयोग कर लिया था, जिसके कारण उन्हें आगे के शेष ज्ञान से वंचित रहना पड़ा। आचार्यश्री ने लोगों को निरंतर ज्ञानाराधना करने की पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि ज्ञान कहीं से भी प्राप्त हो, उसे ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए।

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