दक्षिण भारत न्यूज नेटवर्ककिट्टूर(धारवा़ड) । संतश्री ललितप्रभसागरजी महाराज ने कहा है कि इंसान को बांटना वरदान नहीं, अभिशाप है। उदाहरण देते हुए संतश्री ने कहा कि कभी जैनी दिगम्बर-श्वेताम्बर के नाम पर टूटे, तो कभी मंदिर-मुंहपत्ति के नाम पर, परिणामस्वरुप हमारी ताकत कमजोर हुई। व्यक्ति से धर्म-कर्म हो तो ठीक, न हो तो कोई दिक्कत नहीं, पर वह उदार बने और सोच को सकारात्मक बनाए यही सबसे ब़डा धर्म है। उन्होंने कहा कि अगर हमारे प्रवचनों में हर एक कौम के लोग आते हैं तो उसका एक मात्र कारण अपने नजरिये को विराट बनाना है। याद रखें, छोटे केनवास पर कभी ब़डे चित्र बनाए नहीं जा सकते, चित्रों को ब़डा बनाना है तो कृपया अपने केनवासों को ब़डा बनाएं। दौरान श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि दुनिया की सबसे ब़डी शक्ति पारस्परिक रहने वाली एकता है। अगर दुनिया में मुठ्ठी भर लोग भी साथ हैं तो ताकतवर कहलाएंगे और हजारों लोग भी बिखरे हुए हैं तो अर्थहीन हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि जब तक हम साथ-साथ हैं तब तक हमारी कीमत है और जैसे ही अलग हुए कि कीमत खत्म। माना कि भले ही तिनकों की कोई औकात नहीं होती, पर वही तिनके मिल जाएं तो रस्सी बनकर हाथी को बांधने में सफल हो जाते हैं्। उन्होंने कहा कि भाइयों में अगर एकता है तो कोई भी उनके सामने आँख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं करेगा, नहीं तो टूटे हुए भाइयों पर प़डोसी भी भारी प़ड जाएगा। संतश्री ने कहा कि आज जो समाज एक है उनकी चारों ओर तूती बजती है, कोई उनकी ओर अंगुली उठाने की भी हिम्मत नहीं करता, पर जो समाज टूटे हुए हैं तो उन्हें गली का कुत्ता भी नहीं पूछता। उन्होंने कहा कि हमने पिछले पच्चीस सौ सालों तक मंदिर-मस्जिद, पंथ-ग्रंथ, मूर्ति-मुंहपत्ति, वस्त्र-शास्त्र के नाम पर ल़ड-ल़डकर खोया ही खोया है, अब हम केवल पच्चीस सालों के लिए इन सब भेदभावों को भुलाकर एक हो जाएं तो मात्र पच्चीस सालों में भारत और हम इस दुनिया में सिरमोर हो जाएंगे। इससे पूर्व संतों का स्थानकवासी परम्परा में श्रमण संघ के उपप्रवर्तक श्री नरेशमुनिजी एवं शालिभद्रमुनिजी से विहार के दौरान हाइवे पर मंगल मिलन हुआ्। उन्होंने आपस में वंदन और प्रणाम कर एक-दूसरे की कुशलक्षेम पूछी और अनेक धर्मबिंदुओं पर चर्चा की। इस अवसर पर संतप्रवर ने नरेशमुनिजी की २७ सालों से चल रही एकांतर तपस्या की अनुमोदना की। कार्यक्रम में सैक़डों श्रद्धालु उपस्थित थे।

LEAVE A REPLY