बेंगलूरु/दक्षिण भारतशहर के नगरथपेट स्थित अजितनाथ जैन संघ में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए आचार्यश्री चन्द्रयशसूरीश्वरजी ने कहा कि मनुष्य दर्शन, ज्ञान और चारित्र के माध्यम से अपना जीवन सफल बना सकता है। ज्ञान प्राप्त करके आत्मतत्व को पहचनाना होगा। आत्मतत्व को पहचान कर ही दुखों से छुटकारा पाया जा सकता है। जीवन में सुख और दुख दोनों है, जब हम बाह्य की ओर देखते हैं तो दुख ही दुख दिखता है। अंतरात्मा में देखते है तो सुख ही सुख दिखता है अर्थात सुख अंतर की बात है। जो व्यक्ति अंतर की आत्मा की आवाज सुनता है वह हमेशा सुखी रहता है। चित्त की निर्मलता भी आत्मबोध में सहायक होती है। अपने आपको जानने लिए कुछ विषयांे से विरक्ति लेनी होती है जैसे अहंकार और क्रोध से। चित्त को जितना शांत रखेंगे उतनी ही आत्मशक्ति का अनुभव हममें होता है। सच्चा सुख उसे प्राप्त होता है जिसकी आवश्यकता कम हो।

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