बेंगलूरु/दक्षिण भारतयहां यशवंतपुर स्थित तेरापंथ भवन में चातुर्मासार्थ विराजित मुनिश्री रणजीतकुमारजी एवं मुनिश्री रमेशकुमारजी के सान्निध्य में ‘नमस्कार महामंत्र साधना प्रयोग सप्ताह’’ के अंतर्गत ‘णमो सिद्धाणं’’ पद की विवेचना एवं प्रयोग मंगलवार को किए गए। इस अवसर पर सिद्ध भगवान के बारे में अपने उद्बोधन में रणजीतकुमारजी ने कहा कि अरिहंत दीक्षा के समय सिद्धों को नमस्कार करते हैं, फिर वे साधना करते हैं्। अरिहंत कभी भी अरिहंत को नमस्कार नहीं करते। उन्होंने कहा कि सिद्ध हमारे आदर्श हैं। उनके ध्यान से व स्मरण से, हमारे कर्मों की निर्जरा होती है। णमो सिद्धाणं की विवेचना करते हुए रमेशकुमारजी ने कहा कि संसारी जीवों में सबसे उत्कृष्ट आत्मा परमात्मा कहलाती है। उन्होंने कहा कि जिस समय विशुद्ध ध्यान से कर्म रूपी ईंधन को भस्म कर दिया जाता है, उस समय वही आत्मा परमात्मा हो जाती है। मुनिश्री ने कहा कि जैन दर्शन परमात्मा को ही ईश्वर मानता है तथा परमात्मा को ही सिद्ध माना है। परमात्मा का स्वरूप अकर्ता, अमूर्त, चैतन्यमय और समदर्शी सा है। उनके आठ कर्म क्षय होने से आठ आत्म गुण प्रकट होते हैं। इससे पूर्व मुनिश्री ने ‘नमस्कार महामंत्र’’ का रंगों के साथ प्रयोग कराया।

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