सिद्धचक्र की साधना है नवपद : आचार्य मुक्ति सागरसूरी

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दक्षिण भारत न्यूज नेटवर्कबेंगलूरु। यहां चिकपेट स्थित आदिनाथ जैन श्वेतांबर मंदिर ट्रस्ट के तत्वावधान में शाश्वती आयंबिल ओली की नौ दिवसीय आराधना आचार्यश्री मुक्तिसागरसूरीश्वरजी की निश्रा में शुक्रवार से शुरु हुई। इस अवसर पर आचार्यश्री ने संसार में तीन चीजों क्रमशः दुख, रोग और पाप को भयंकर बताते हुए कहा कि दुख की ज़ड इच्छा है, रोग की ज़ड जन्म है और पाप की ज़ड सुख है। उन्हांेने कहा कि इन तीनों को समाप्त करने के लिए नवपद सिद्धचक्र की साधना है। अरिहंत पद पर अपने प्रवचन में मुक्तिसागरजी ने कहा कि यह जैन शासन की मौलिक आराधना है। उन्होंने कहा कि आराधना और धर्म में अंतर है। सिर्फ धर्म-आराधना क्रिया हमें संसार का सुख तो दे सकती है, लेकिन संसार से हमारा छुटकारा नहीं करवा सकती है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति आराधना तो करता है, मगर उसमें आराधक भाव नदारद होते हैं। इस अवसर पर सहसचिव गौतम सोलंकी, ट्रस्टी देवकुमार जैन, आयंबिल चेयरमैन दीपचंद चौहान सहित अनेक श्रद्धालु मौजूद रहे। तीन सौ आराधकों को आयंबिल तप लाभार्थी जमुबेन चंदनमल भंडारी परिवारवालों की ओर से कराया गया। सुरेन्द्रगुरुजी की देखरेख में सभी विधि विधान संपन्न हुए।

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