दक्षिण भारत न्यूज नेटवर्कबेंगलूरु। स्थानीय राजाजीनगर जैन स्थानक में विराजित श्री जयधुरंधरमुनिजी ने बुधवार को कहा कि इच्छा आकाश के समान अनंत होती है। उन्हांेने कहा कि जिस प्रकार आकाश का कोई छोर नहीं होता, ठीक उसी प्रकार इच्छाएं भी असीम हैं। मुनिश्री ने कहा कि जिस समय साधक इच्छाओं का अंत कर देता है, उसे अनंत आत्मसुख की प्राप्ति हो जाती है। श्रावक के व्रतों की प्रवचन श्रृंखला के अंतर्गत पांचवंे व्रत का विवेचन करते हुए जयधुरंधरजी ने कहा कि ममत्व, तृष्णा आदि घटाने के लिए परिग्रह का परिणाम करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आसक्ति, संग्रहवृत्ति और अप्राप्त को प्राप्त करने की इच्छा को भी परिग्रह माना गया है। मुनिश्री ने कहा कि इच्छा का खड्डा भरने का एकमात्र उपाय संतोष एवं मर्यादित जीवन है।व्रत व आराधना को श्रावक के लिए पुनवानी ब़ढाने वाला बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि मर्यादित जीवन होने के कारण धन संग्रह की आकांक्षा नहीं, अपितु त्याग की भावना होती है। उन्होंने यह भी कहा कि एक घेरे में अपनी इच्छाओं को सीमित करना जरुरी है।

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