कोयम्बटूर/दक्षिण भारत श्रमण संघीय श्रीसुमतिप्रकाशजी के शिष्य श्री समकितमुनिजी ने सोमवार को अपने प्रवचन में कहा कि वाणी व्यक्ति के व्यक्तित्व को दर्शाती है। वाणी के सदुपयोग से व्यक्ति देव रुप बन सकता है और दुरुपयोग से राक्षस भी बन जाता है। मुनिश्री ने कहा कि घर को नंदनवन बनाने के लिए सबसे जरुरी है बोलना सीखें। बोलने का विवेक न रहने के कारण स्वर्ण जैन घर भी नरक के समान बन जाता है। बच्चों को धार्मिक क्रियाएं सिखाने से पूर्व बोलने का विवेक सिखाएं। बोलने का सही ढंग नहीं आता तो धार्मिक क्रियाएं भी बेकार हो जाती हैं। मुनिश्री ने कहा कि मधुर बोलंे, मीठा बोलें लेकिन मीठी छुरी न बनें। प्रिय बोलना भी मोक्ष का एक उपाय है। कोई हमसे प्रिय बोले तो उसे धन्यवाद दें और अप्रिय वचन कहें तो उसे मुस्कुराकर माफ कर दें। परिवार में शांति का वातावरण रखने के लिए वाणी में अक़डपन नहीं लाएं, विनम्रता लाएं। मुनिश्री ने कहा कि चार प्रकार के वचन नहीं बोलना चाहिए, कभी हुकुम न चलाएं, अश्लील शब्द न बोलें, कटु शब्द न बोलें, कटाक्षपूर्ण शब्द न बोलें। इस मौक पर संघ के मंत्री धनराज चोरि़डया ने बताया कि गुरुवार को संघ स्थापना के मौके पर एकासन एवं सामायिक दिवस मनाया जाएगा।

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