प्रगति के साथ सही दिशा भी जरुरी : आचार्य रत्नसेनसूरी

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दक्षिण भारत न्यूज नेटवर्कबेंगलूरु। शहर के ऑसबन रोड स्थित चन्द्रप्रभस्वामी जैन मंदिर में पहंुचे आचार्यश्री चन्द्रभूषणसूरीश्वरजी एवं रत्नसेनसूरीश्वरजी का संघ की ओर से विशेष स्वागत किया गया। इस मौके पर उपस्थित जनों को संबोधित करते हुए आचार्यश्री चन्द्रभूषणसूरीश्वरजी ने कहा कि मनुष्य जन्म का सबसे ब़डा उद्देश्य आत्मा की साधना है, परन्तु जगत के अधिकतम लोग इस सत्य को भूलकर, अज्ञानता के कारण, धन, स्वजन और सत्ता को पाने के लिए इस जन्म को व्यर्थ गंवा रहे हैं । इस अज्ञान को नाश करके शाश्वत सत्य को पाने में ही मनुष्य जन्म की सार्थकता है। आचार्यश्री रत्नसेन सूरीश्वरजी ने कहा कि भारतीय संस्कृति का जितना नुकसान मुगल साम्राज्य ने किया, उससे भी ज्यादा नुकसान अंग्रेज शासकों ने किया है। मुगलों ने तो केवल ढांचागत नुकसान किया अपितु अंग्रेजों ने धर्म परिवर्तन के साथ साथ भारतीय शिक्षा पद्धति को बदलकर अपनी पाश्चात्य शिक्षण पद्धति को हम पर थोप कर हमारी संस्कृति को मूल से नष्ट कर दिया। आचार्यश्री ने कहा कि आज भारतीय लोग संस्कारों को भूलते जा रहे है और केवल पाश्चात्य संस्कृति का अनुसरण कर अपने आप को पतन की ओर ले जा रहे हैं। आचार्यश्री ने कहा कि अंग्रेजों ने हम पर लगभग १५० वर्ष शासन किया परन्तु हम उन्हें धोती नहीं पहना सकते बदले में उन्होंने अपनी वेशभूषा और बोली हम पर लाद दी। आचार्यश्री ने कहा कि हमें पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से निकलकर भारतीय संस्कृति व संस्कारों का अनुसरण करना चाहिए तभी हमारा देश वास्तव में विकास-प्रगति की राह पर अग्रसर होगा।

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