मैसूरु। शहर के शालीग्राम क्षेत्र में पहुंचे पुष्पगिरितीर्थ के प्रणेता व दिगंबर संत आचार्यश्री पुष्पदंतसागरजी ने मंगलवार को अपने उद्बोधन में कहा कि प्रेम स्वयं के साथ-साथ जगत के लिए देश, समाज, मानवता के लिए वरदान होता है। प्रेम भिखारी नहीं, दाता है, पुजारी है। उन्होंने कहा कि प्रेम सागर का खारा पानी नहीं, गंगा सा मधुर जल है जो कि कभी स़डता नहीं है। प्रेम अधिकार नहीं जताता, आत्मीयता दर्शाता है। वे यह भी बोले कि प्रेम और स्नेह की भाषा में बहुत शक्ति होती है। आचार्यश्री ने व्यक्ति को निस्वार्थ अपना कार्य करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि व्यक्ति नाम से नहीं, काम से जाना जाता है। उन्होंने कहा कि पहले परिवार प्रिय बनना जरुरी है तभी जनप्रिय बना जा सकता है। जो घर-परिवार को नहीं संभाल पाते वे समाज और देश को भी संभाल नहीं सकते हैं। उन्होंने कहा कि आकाश में उ़डने वाले बादल कभी प्यास नहीं बुझा सकते हैं। आचार्यश्री पुष्पदंतजी ने कहा कि दिलों पर शासन करने के लिए प्रेम और सेवा की भावना से जीना जरुरी है तभी पृथ्वी का कण-कण व्यक्ति को अपने हृदय में बसा लेगा। उन्होंने कहा कि सभी की राय से सभी के साथ मिलकर चलने से ही सदा सफलता का हकदार बना जा सकता है। आचार्यश्री ने कहा कि चंद्रमा अकेला आकाश में शोभा नहीं देता है, अकेला इंजन कोई नहीं देखता है, अकेला हाथ कुछ नहीं कर सकता है, अकेला खिला़डी जीत का सपना पूरा नहीं कर सकता है तथा एक अक्षर से संविधान की रचना नहीं हो सकती है व सेनापति कितना भी चतुर बलशाली हो लेकिन शत्रु को नहीं जीत सकता है इसलिए मिलकर सबके साथ चलने में ही सबका भला है।

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