विजयवा़डा/दक्षिण भारतयहां के श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन भवन में मुनिश्री संयमरत्नविजयजी, मुनिश्री भुवनरत्नविजयजी एवं साध्वीश्री राजप्रज्ञाश्रीजी के सान्निध्य में २५७५वां जिनशासन स्थापना दिवस अर्हम ग्रुप द्वारा आयोजित किया गया। परमात्मा श्री महावीर स्वामी, श्री गौतम स्वामी की तस्वीर पर माल्यार्पण के पश्चात् सकल जैन समाज के पदाधिकारियों ने ध्वजारोहण किया। इस अवसर पर प्रवचन में मुनि श्री ने कहा कि निज पर शासन करने वाला ही अनुशासन के साथ चल सकता है। आज तक अनुशासन से ही जिनशासन आगे ब़ढता रहा है। जहाँ अनुशासन नहीं, वहाँ जिनशासन नहीं। कर्मों को जीतने के कारण ही यह शासन जिनशासन के नाम से जाना जाता है। २५७५ वर्ष पूर्व प्रभु महावीर स्वामी ने सा़ढे बारह वर्ष की कठोर साधना करने के पश्चात् वैशाख सुदी ग्यारस के दिन ही साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका रूप चतुर्विध संघ की स्थापना की थी। गणधरों को त्रिपदी की देशना दी और बताया कि शरीर उत्पन्न होने के साथ नष्ट भी होता है किंतु आत्मा अजर-अमर शाश्वत रहती है। जो शाश्वत रहे,वही तत्व-सार है और जो नश्वर है,वह सब असार है। प्रभु की भाषा निर्मल, निर्दोष,निर्लिप्त व सहज होने के कारण वही भाषा जीवन की एक नई परिभाषा बन जाती थी। हम भी हमारी भाषा को निर्मल, निर्दोष व सहज बनाने का प्रयास करें । जिनशासन स्थापना के दिन अनुशासन को हमें हमारे हृदय में स्थापित करना है। इस अवसर पर पन्नालाल जैन ने प्रभु महावीर स्वामी के जीवन-चरित्र का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया। रविवार को स्थानक भवन में मुनि श्री संयमरत्न विजयजी के प्रवचन होंगे।

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