बेंगलूरु/दक्षिण भारत यहां बसवनगु़डी स्थित विमलनाथ जैन मंदिर-जिनकुशल जैन दादावा़डी के आराधना भवन में बुधवार को अपने उद्बोधन में आचार्यश्री रत्नसेनसूरीश्वरजी ने कहा कि स्त्री व पुरुष की शारीरिक कुदरती रचना भिन्न-भिन्न है, इसलिए दोनों को आचार मर्यादा की सुरक्षा के लिए भिन्न-भिन्न ही वेश भी जरुरी है। उन्होंने कहा कि पुरुष के लिए पुरुष का वेश और स्त्री के लिए स्त्री का वेश ही शोभास्पद होता है, लेकिन दुर्भाग्य है कि आज स्त्री वेश की मर्यादाएं धीरे-धीरे टूटती जा रही हैं। पहनावा हमारी संस्कृति और सभ्यता को दर्शाता है । आचार्यश्री ने कहा कि वर्तमान दौर में अधिकांश कन्याएं व युवतियां अपने स्त्री वेश की मर्यादाओं को तो़डकर पुरुष वेश ही पहन रहीं हैं। ्त्रिरयों ने अलंकार लगभग छो़ड दिए हैं, इसके स्थान पर इनके हाथों मंे मोबाइल और मोटरसाइकिल की सवारी ब़ढ गई है। रत्नसेनजी ने कहा कि पुरुष वेश, स्त्री के लिए अत्यंत ही खतरनाक है।

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