बेंगलूरु/दक्षिण भारतबेंगलूरु। ‘वीर नाम के हीरे-मोती.., गुरु नाम के हीरे-मोती, मैं बिखराऊं गली-गली, लेलो रै कोई राम का प्यारा शोर मचाऊं गली-गली..।’’ इन पंक्तियों के साथ श्रमण संघीय संत श्री रमणीकमुनिजी जब अपना प्रवचन संपन्न करते हैं तो गो़डवा़ड भवन में प्रतिदिन ब़डी संख्या में पहुंच रहे हर श्रद्धालु के तन-मन में धार्मिकता का भाव जागृत होता दिखाई प़डता है। यहां के गो़डवा़ड भवन में संतश्री वर्द्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ चिकपेट शाखा के तत्वावधान में ‘आध्यात्मिक चातुर्मास-२०१८’’ के तहत श्रमण संघीय उपाध्यायश्री रवींद्रमुनिजी की निश्रा में प्रातः ९ बजे से करीब सवा घंटे का अनुशासित व लयबद्ध दैनिक प्रवचन हो रहे हैं। मंगलवार को उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि जो जीवन की सत्यता को जान लेता है, जीवन के अनुभव को स्वीकार कर लेता है ऐसे व्यक्ति की चलते-फिरते ही सामायिक हो जाती है। फिर वह किसी गलतफहमी का शिकार नहीं हो सकता। उसका मोह कमजोर प़ड जाता है। जितना मोह कमजोर होगा, उतना ही व्यक्ति आत्मा के निकट होता है। मुनिश्री ने कहा कि आत्मा के निकट पहुंचने के लिए सामायिक से बेहतर कुछ नहीं है। मोह को मैत्री में बदलना ही सामायिक है जो कि बहुत ब़डा उपक्रम है। उन्हांेने कहा कि मोह को निद्रा व मदिरा भी कहते हैं। निद्रा हो या मदिरा, इन दोनों को धारण करने के बाद व्यक्ति बेहोश हो जाता है। पंचे्द्रिरय की विस्तार से व्याख्या करते हुए मुनिश्री ने कहा कि यह मन ही है जो इसांन को भटकाता है, लेकिन भगवान महावीर की वाणी में मन की चालाकी का इलाज है। दिमाग पर होने वाले किसी भी प्रकार के अतिक्रमण को रोकने के लिए ही प्रतिक्रमण सरीखी धार्मिक क्रिया की जाती है। मुनिश्री ने कहा कि मोह में स्वार्थ है तथा मैत्री में परमार्थ है। उन्होंने कहा कि धर्म और संप्रदाय में वही अंतर है जो शरीर और आत्मा में है। संप्रदाय को शरीर व दीवार तथा धर्म को आत्मा व द्वार (दीवार) का प्रतीक बताते हुए उन्होंने कहा कि संप्रदाय कितना भी ब़डा हो उसमें से धर्म निकल जाता है, संप्रदाय होना बुरी बात नहीं है लेकिन उसमेंे आत्मा होनी चाहिए। व्यक्ति में चेतना, समझ व ज्ञान आत्मा की वजह से ही होती है। उन्होंने कहा कि संप्रदाय का जिंदा रुप है धर्म। मुनिश्री ने कहा कि संप्रदाय जब तक दिल, वस्त्रों, मुखव्त्रिरका, वेशभूषा व मंदिरों तक जु़डा है तब तक तो ठीक है परंतु जब यह दिमाग में प्रवेश कर जाता है, खतरनाक परिणाम देने लगता है। ऐसे में दूसरे लोगों में दोष व कमियां ही नजर आने लगती हैं। व्यक्ति को कट्टरता से काटने वाला नहीं, उदारता से उदार व परोपकारी बनने की सीख देते हुए रमणीकमुनिजी ने कहा कि सत्संग व स्वाध्याय के माध्यम से यह आभास होना जरुरी है कि आत्मा के अलावा कुछ भी नहीं है। उन्हांेने इस अवसर पर ‘इस धरा का इस धरा पर सब धरा रह जाएगा..’’ पंक्ति के माध्यम से कहा कि एक ही चीज व्यक्ति के साथ जाती है और वह है आत्मा। आत्मा में अनंत मैत्री व करुणा है। इससे पूर्व प्रवचन के शुभारंभ पर अनूठी पहल करते हुए रमणीकमुनिजी ने जैन धर्म के चारों संप्रदायों के आचार्यों का जयकारा लगवाया। संतश्री ॠषिमुनिजी ने गीतिका प्रस्तुत की। मांगलिक उपाध्यायश्री रवींद्रमुनिजी ने प्रदान की। कार्यक्रम का संचालन चिकपेट शाखा के महामंत्री गौतमचंद धारीवाल ने किया।संघ के अध्यक्ष ज्ञानचंद बाफना ने बताया कि प्रवचन सभा में आध्यात्मिक चातुर्मास के मुख्य संयोजक रणजीतमल कानूंगा, इंदरचंद सिंघी, शांतिलाल मकाणा, जैन कॉन्फ्रंेस के राष्ट्रीय मंत्री आनंद कोठारी, राजेंद्र कोठारी, प्रज्ञा संघ के अध्यक्ष जयसिंह बिलवाि़डया सहित विभिन्न उपनगरों के अनेक संघों के पदाधिकारी, श्रावक-श्राविकाएं मौजूद थे तथा महाराष्ट्र के पुणे, राजस्थान के जयपुर, देहरादून व पंजाब के विभिन्न शहरों से आए श्रद्धालुओं ने संतवृंदों के दर्शन किए। संतश्री ॠषिमुनिजी ने दोपहर के सत्र में महिलाओं एवं पुरुषों के लिए सामायिक से संबंधित कक्षा में विभिन्न भ्रांतियों को मिटाया। वहीं रात्रि के सत्र में रमणीकमुनिजी के सान्निध्य में सामूहिक रुप से चौमुखी जाप का निरंतर आयोजन सुचारु रुप से जारी है।

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