चेन्नई/दक्षिण भारतयहाँ कुंड्रत्तुर में विराजित श्री कपिल मुनि जी म. सा. ने मंगलवार को अपने प्रवचन में कहा कि स्वयं के जीवन पथ को आलोकित करने के साथ दूसरों की जिंदगी की राहों को रोशन करना दरअसल जिन्दगी का महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। प्रत्येक इंसान को अपने गिरेबां में झांककर देखना चाहिए कि मैं दूसरों की जिंदगी में सहायक बन रहा हूँ या बाधक? जब भी व्यक्ति अपने आपको आगे ब़ढाने के बजाय दूसरों को पीछे खींचता है तो उस इंसान के भीतर सृजन की शक्ति नहीं बल्कि विध्वंस की शक्ति काम कर रही होती है। विध्वंस की शक्ति सक्रिय होने पर इंसान हैवान बन जाता है। जीवन को क्षति पहुंचाने वाले दुर्गुणों की चर्चा करते हुए मुनिश्री ने कहा कि कृपणता एक ऐसा दुर्गुण है जो जीवन में उदारता के गुण को प्रकट नहीं होने देता। जहाँ उदारता है वहाँ मधुरता और सरसता का वास है। उदार व्यक्ति ही लोकप्रिय और भगवान की कृपा का पात्र बनता है। मुनिश्री ने कहा कि कंजूस व्यक्ति उसे माना जाता है जिसके पास प्रचुर मात्रा में शक्ति और साधन है फिर भी उपयोग और उपभोग के मौके दाएं बाएं झांकता है । व्यय नहीं करने के नये नये बहाने खोजता है और अपनी महानता को झूठे आदर्शों और सिद्धांतों के सहारे प्रकट करता है । केवल संग्रह करने की नित नूतन योजना बनाता है। जहाँ सिर्फ संग्रह है वहां खारापन होता है। समुद्र इसका ज्वलंत उदाहरण है। नदी का पानी मीठा होता है क्योंकि वह वितरण करती है। कंजूस व्यक्ति ब़डा शोषण कर्ता भी होता है, वह येन केन प्रकारेण धन संग्रह के लिए न्याय नीति, धर्म, कानून और मानवता सबकी बलि च़ढा देता है । ऐसा व्यक्ति न खुद चैन से जीता है और न किसी को चैन से जीते हुए को देख पाता है उसके सारे कृत्य जघन्य और अमानवीय बन जाते हैं। कंजूस के समान पाखंडी और क्रूर व्यक्ति ढूंढने पर भी नहीं मिलता। जीवन को प्रसन्नता पूर्वक जीने के लिए उदारता के गुण को अपनाना बेहद जरुरी है।

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