‘आत्मा का उत्थान व पतन ध्यान पर निर्भर’

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दक्षिण भारत न्यूज नेटवर्कबेंगलूरु। यहां वीवीपुरम स्थित सिमंधर शांतिसूरी जैन संघ के आराधना भवन में आचार्यश्री चंद्रभूषणसूरीश्वरजी ने सोमवार को अपने उद्बोधन में कहा कि जिस प्रकार एक छोटी सी चिनगारी भयंकर दावानल का रुप ले लेती है, उसी प्रकार क्रोध की एक चिनगारी अनेक जन्मों की साधना को जलाकर भस्मीभूत कर देती है। इस अवसर पर आचार्यश्री रत्नसेनसूरीश्वरजी ने कहा कि आत्मा का उत्थान एवं पतन ध्यान पर ही निर्भर है। उन्होंने कहा कि ध्यान की शुभ्रधारा ही आत्मा को उर्ध्वगामी बनाती है। रत्नसेनजी ने कहा कि दानधर्म के लिए धन की अपेक्षा रहती है, शीलधर्म के लिए इंद्रियों के संयम की अपेक्षा रहती है व तपधर्म के लिए कायबल की अपेक्षा रहती है जबकि भावधर्म की साधना के लिए मन की अपेक्षा रहती है। उन्होंने कहा कि भाव मन में पैदा होता है इसलिए आत्मा के पतन और उत्थान में मन का सबसे अधिक महत्व है। आचार्यश्री ने यह भी कहा कि चारों गतियों में सबसे अधिक शक्तिशाली मन मनुष्य को ही मिला है। उन्होंने कहा कि मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है, जो कि अपने मन के द्वारा चौदह गुणस्थानक के योग्य अध्यवसायों को धारण कर सकता है।

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