बिरुर। यहां आचार्यश्री चंद्रयशसूरीश्वरजी की निश्रा में सोमवार को ‘दक्षिण भारत के प्रथम शिलात्मक जिनालय’’ श्री विमलनाथ नवग्रह सुवर्ण मंदिर का प्रतिष्ठा महामहोत्सव उल्लासपूर्वक शुरु हुआ। प्रातः शुभमुहूर्त की बेला में कांपिल्यपुर नगरी व भरत चक्रवर्ती भोजन मंडप का उद्घाटन विमलनाथ दादा के जयकारों की गूंज के साथ हुआ। इस मौके पर आचार्यश्री ने कहा कि बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में ज्यादातर समय हमारा संसार के रंगराग में अर्थात् अनमोल बहुमूल्य समय ऐसे ही व्यर्थ जा रहा है। आत्महित के लिए कुछ करने अथवा जागृत होने की सीख देते हुए चंद्रयशजी ने कहा कि हमें सारे संसार के मोह का त्याग कर प्रतिष्ठा उत्सव में जु़ड जाना चाहिए। परमात्मा जिनालय के साथ हमारे हृदय में भी प्रतिष्ठित होने चाहिए तभी हमारी जीवनरुपी नौका संसार सागर से पार हो पाएगी। मध्यान्ह में नूतन जिनालय में अंजनशलाका संबंधित पूजन हुए, जिसमें दशदिक्पाल पाटला पूजन, वेदिका पूजन, क्षेत्रपाल पूजन और जलयात्रा आदि के मंगल विधान सुरेन्द्रभाई व अश्विनभाई ने संपन्न करवाए। नरेन्द्र वाणीगोता ने संगीतमय प्रस्तुतियां दी। कांपिल्यपुर नगरी का लाभ देवीचंद हुलासीदेवी वेदमूथा परिवार ने तथा भरत चक्रवर्ती भोजन मंडप का लाभ शांतिबाई माणकचंद पितलिया परिवार ने लिया।

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