दक्षिण भारत न्यूज नेटवर्कराणेबनूर। राष्ट्रसंत ललितप्रभसागरजी ने कहा कि हमें धार्मिक बनना चाहिए, पर धर्म के नाम पर अंधा नहीं बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज अहिंसा की कम और प्रेम तथा मोहब्बत के पैगाम की जरूरत ज्यादा है ताकि पारिवारिक दूरियां कम हो सकें, समाजों के बीच आपसी सहयोग ब़ढ सके और साम्प्रदायिक सद्भाव का माहौल बन सके। संतश्री रविवार को यहां रेलवे स्टेशन रो़ड स्थित जैन श्वेताम्बर धर्मशाला में सकल जैन संघ द्वारा आयोजित प्रवचन कार्यक्रम के दौरान श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित कर रहे थे। परिवार से प्रेम की शुरुआत करने का पाठ प़ढाते हुए ललितप्रभजी ने कहा कि व्यक्ति सबसे प्रेम करे, लेकिन प्रेम की शुरुआत घर-परिवार से करे। मंचों पर ख़डे होकर उपदेश देना और मासक्षमण की तपस्या करना सरल है, पर घर में चार भाइयों का मिल-जुलकर रहना बहुत मुश्किल है। अपने जीवन का यथार्थ सुनाते हुए संतश्री ने कहा कि हमने न तो वैराग्य से संन्यास लिया और न ही मोक्ष पाने की इच्छा से । जहां माता-पिता ने आत्मकल्याण के लिये संन्यास लिया, वहीं हमने भी बु़ढापे में उनकी सेवा करने के लिए स्वयं को संयम जीवन में प्रवेश करा दिया। आज भी हमारे लिए समाज बाद में है और माता-पिता पहले हैं। उन्होंने कहा कि दुनिया में भगवान की कोई भी प्रतिमा ऐसी नहीं है जिसे स्वयं भगवान ने बनाया हो। जिन भगवान की मूर्तियों को हम बनाते हैं तो उनकी तो हम पूजा करते हैं, फिर जो मां-बाप हमें बनाते हैं उनकी पूजा भी होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जो माँ-बाप की सेवा नहीं करता, दुनिया का ऐसा कोई भगवान नहीं जो उस व्यक्ति की पूजा को स्वीकार कर सके।इससे पूर्व श्री ललितप्रभजी और मुनिश्री शांतिप्रियजी का यहां राणेबेनूर पहुंचने पर जैन संघ के श्रद्धालुओं द्वारा स्वागत किया गया। महामंत्री अरविंद जैन ने बताया कि राष्ट्रसंतों ने धर्मशाला में मांगलिक देकर विहार कर दिया। वे सोमवार की शाम ६ बजे हावेरी पहुंचेंगे, जहां रात्रि ८ बजे जैन मंदिर के पास, जैन भवन में प्रवचन कार्यक्रम होगा।

Facebook Comments

LEAVE A REPLY