नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ भूमि अधिग्रहण से संबंधित मामले में विभिन्न पीठ के परस्पर विरोधी दृष्टिकोण से उठे विवाद के परिप्रेक्ष्य में छह मार्च को सारे मसले पर विचार करेगी। इस प्रकरण में भूमि अधिग्रहण के मामले में तीन सदस्यीय एक पीठ ने न्यायिक अनुशासन और शुचिता के प्रति चिंता व्यक्त की थी। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा इस संविधान पीठ की अध्यक्षता करेंगे। यह मामला २१ फरवरी को उस समय सुर्खियों में आया जब न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने शीर्ष अदालत की एक अन्य तीन सदस्यीय पीठ के आठ फरवरी के आदेश पर एक तरह से रोक लगा दी थी जिसमें व्यवस्था दी गई थी कि यदि पांच साल की अवधि के भीतर मुआवजा नहीं लिया जाता है तो यह भूमि अधिग्रहण रद्द करने का आधार नहीं हो सकता है। न्यायमूर्ति लोकूर की अध्यक्षता वाली पीठ ने २१ फरवरी को टिप्पणी की कि इस निष्कर्ष पर पहुंचते समय शायद न्यायिक अनुशासन के साथ छे़डछा़ड की गई है क्योंकि २०१४ में एक अन्य तीन सदस्यीय खंडपीठ द्वारा सुनाए गए फैसले से इत्तेफाक नहीं रखने के कारण इस मामले को वृहद पीठ के पास भेजा जाना चाहिए था।

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