विजयवा़डा/दक्षिण भारतशहर के राज-राजेन्द्र भवन में विराजित मुनिश्री संयमरत्नविजयजी, श्री भुवनरत्नविजयजी ने मंगलवार को अपने प्रवचन में सुश्रावक की परिभाषा बताते हुए कहा कि श्र से श्रद्धा, व से विनय-विवेक और क से क्रिया अर्थात् जो श्रद्धापूर्वक विनय व विवेक के साथ क्रिया करता है तथा १४ नियम व १२ व्रतों का पालन करता है, वही सुश्रावक होता है। उन्होंने एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि कुमारपाल राजा ऐसे श्रावक थे, जिन्होंने अपने गुरु हेमचंद्राचार्यजी के आदेश से अट्ठारह देशों में अहिंसा का प्रचार-प्रसार कराया एवं जिनालय निर्माण के साथ ही अनेकों साधर्मिक लोगांें को आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से मजबूत भी बनाया था।

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