दक्षिण भारत न्यूज नेटवर्कबेंगलूरु। यहां वीवीपुरम स्थित सिमंधर शांतिसूरी आराधना भवन में विराजित आचार्यश्री चंद्रयशसूरीश्वरजी व उपप्रवर्तकश्री कलापूर्णविजयजी ने शुक्रवार को अपने उद्बोधन में कहा कि नवपद की आराधना विषयों का वमन, कषायों का शमन और इ्द्रिरयों का दमन करती है। उन्होंने कहा कि नवपद की आराधना से क्लेशरहित वचन, वासनारहित इ्द्रिरय, हिंसारहित जीवन, रोगरहित तन, संक्लेशरहित मन, भयरहित हृदय और स्वार्थरहित संबंध बन जाते हैं। आचार्यश्री ने मोक्ष में जाने का नेशनल हाईवे मार्ग नवपद को बताते हुए कहा कि जिनेश्वर परमात्मा ने मोक्ष प्राप्ति के लिए असंख्य योग व उपाय बताए हैं, इनमें नवपद मुख्य योग है। उन्होंने यह भी कहा किचार गति का नाश और सिद्धपद की प्राप्ति नवपद के ध्यान से ही होती है। नवपद में पहले दिन अरिहंत पद विषय पर अपने उद्बोधन में चंद्रयशजी ने कहा कि अनंतपुण्य के स्वामी अरिहंत परमात्मा हैं, वे करुणा के सागर होते हैं। जिसके हृदय में करुणा न हो वह अरिहंत नहीं बन सकता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में व्यक्ति का हृदय करुणाहीन हो गया है। स्वार्थभाव इतना ब़ढ गया है कि इंसान को आज अपने स्वयं के अलावा कोई भी नहीं दिखता है। अरिहंत परमात्मा के हृदय में जागत के समस्त जीवों के प्रति करुणाभाव पैदा होता है, तभी अर्हद् तत्व का प्रागट्य होता है। अरिहंत की आरधना के लिए अंतःकरण में झांकने की सीख देते हुए आचार्यश्री ने कहा कि हृदय में करुणाभाव को जगाना जरुरी है।

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