balmuni padmprabhchandra ji
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बेंगलूरु/देवेन्द्र शर्मा। बेंगलूरु के खुशनुमा प्राकृतिक माहौल में सुबह 8 बजे से पैलेस ग्राउंड के प्रिंसेज श्राइन सभागार में करीब चार हजार लोगों की भीड़। सुबह का नाश्ता छोड़कर आगे की सीट पर पहुंचने की आपाधापी। पहली बार कोई धार्मिक कार्यक्रम तय समय से प्रांरभ। सभी आए श्रद्धालुओं के मन में एक अकल्पनीय घटना का साक्षी बनने का उत्साह। स्वयंसेवक सभी उपस्थित जनों को उनकी तय सीटों तक पहुंचाते हुए। सभा में अनेक जैन आचार्य, साधु साध्वियों का पदार्पण। सभागार खचाखच भरा हुआ।

करीब 9 बजे स्वयं सेवकों ने पूरे सभागार में उपस्थित भी़ड को 10 सेक्शन में बांटा। संचालक सुरेन्द्र गुरुजी व अरविंद कोठारी ने आवश्यक जानकारी दी। अपने गुरु महाशतावधानी मुनिश्री अजीतचंद्रसागरजी म.सा के साथ 17 वर्षींय बाल शतावधानी श्री पद्मप्रभचन्द्रसागरजी का सभागार में प्रवेश। प्रवेश होते ही गुरु हमारो अंतर्नाद, हमने आपो आशीर्वाद का जयघोष। महाशतावधानी के आते ही महाशतावधान का कार्यक्रम विधिवत प्रारंभ हुआ।

सबसे पहले मां सरस्वती की वंदना कर सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया। यह माहौल था रविवार को पैलेस ग्राउंड का। मौका था शहर के अक्कीपेट स्थित वासुपूज्य स्वामी जैन संघ में चातुर्मासार्थ विराजित आचार्यश्री नयचंद्रसागरसूरीश्वरजी एवं महाशतावधानी मुनिश्री अजीतचंद्रसागरजी म.सा की प्रेरणा में महाशतावधान आयोजक समिति और अक्कीपेट संघ के तत्वावधान में ‘महाशतावधान महोत्सव’ का। उद्देश्य था कि विभिन्न लोगों द्वारा पूछे गए प्रश्न व दिखाए गए चित्रों को सही क्रम में क्रमवार व उल्टे क्रम में 17 वर्षींय बाल शतावधानी श्री पद्मप्रभचन्द्रसागरजी द्वारा बताने का।

सौ अवधान को याद रखना है शतावधान
अक्कीपेट स्थित वासुपूज्य स्वामी जैन संघ व महाशतावधान आयोजक समिति के पदाधिकारियों ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन कर कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत की। अक्कीपेट संघ के अध्यक्ष उत्तमकरण मेहता ने उपस्थित जनों का स्वागत किया। स्वागत के बाद महाशतावधानी मुनिश्री अजीतचंद्रसागरजी म.सा. एवं एंकर निकुलभाई शाह ने उपस्थित जनों को महाशतावधान करने की प्रक्रिया व प्रश्न पूछने का तरीका बताया।

मुनिश्री अजीतचंद्रसागरजी म.सा ने बताया कि शतावधान शब्द शत और अवधान दो शब्दों के संयोजन से बना है । शत मतलब सौ और अवधान का मतलब याद रखना। दौ सौ वस्तुओं को एक साथ याद रखने की अनोखी विद्या है महाशतावाधान। शातावधानी बालमुनि साधक अपने तप, त्याग, स्वाध्याय, साधना एवं ध्यान की शक्ति से सौ व सौ से अधिक वस्तुओं को भी याद रख सकते हैं, फिर याद की हुई वस्तुओं को साधक सीधे क्रम या उल्टे क्रम या फिर अनियमित क्रम में हजारों व्यक्तियों के सामने बताते हैं। फिर शुरु हुआ 200 प्रश्नों को पूछने का सिलसिला। एंकर ने प्रश्न पूछने व प्रश्न नंबर दी हुई निर्धारित पुस्तक में सभी लोगों से नोट करने को कहा ताकि जब बालमुनि इन प्रश्नों का उत्तर दें तो उन्हें चेक किया जा सके।

प्रश्नों को बांटा 20 अलग श्रेणियों में
भीड़ के 10 सेक्शनों में से 20अलग अलग श्रेणी के 10-10 सवाल पूछे गए अर्थात कुल मिलाकर 200 प्रश्न पूछे गए। इन प्रश्नों में 1 से 10 तक सात शब्दों में प्रश्न थे। 11 से 19 तक समानार्थी व विरुधार्थी समांतर राशि का जोड़, 21 से 30 तक सुवाक्य, कहावत व मुहावरे, 31 से 39 तक जैन-अजैन धर्मग्रंथों के नाम, फिर समान्तर राशि का जोड़, 41-50 तक जैन-अजैन संतों के नाम, 51 से 59 तक नदियों व पर्वतों के नाम, 60 वें प्रश्न में चोरस तीन बाक्स का सर्वतो भद्र यंत्र, 61 से 70 तक पवित्र त्यौहार व पर्व, 71 से 79 तक वैज्ञानिकों व तत्वचिंतकों के नाम, 80वें प्रश्न में एक शास्त्रीय राग, 81 से 90 तक विभिन्न देशों की करंसी, 91 से 99 तक पंच प्रतिक्रमण व स्मरण सूत्र की गाथा, 100वें प्रश्न में पांच बाक्स का सर्वतो भद्र यंत्र आदि प्रश्न थे।

एकसाथ एक समय पर ही पूछे कई प्रश्न
101-130 तक मुनिश्री को विभिन्न लोगों द्वारा मात्र वस्तुएं कुछ सेकेंड्स के लिए दिखाई गई तथा कुछ प्रश्न खाली भी छोड़े गए। 131-135 तक विभिन्न भाषाओं के शब्द, 136 से 150 तक शीघ्र श्रवण अवधान के अंतर्गत विभिन्न वस्तुओं के नाम, 151 से 170 तक संयुक्त चित्र दर्शन अवधान के प्रश्न थे। 171 से 185 तक 15 लोगों को बालमुनि ने गणित के प्रश्न हल करवाए तथा उनके उत्तर याद रखे। 186 से 188 तक जैन आगमों के पाठ, 189-190 में भगवद् गीता के अध्याय से प्रश्न। 191-199 तक संयुक्त अवधान में एक साथ कई प्रश्न पूछे गए। जैसे कोई व्यक्ति गणित का प्रश्न पूछ रहा था, साथ ही घंटनाद भी चल रहा था तो उसी समय कोई व्यक्ति उनके शरीर में कोड़ी का स्पर्श करा रहा था, साथ ही संगीत की धुन भी चल रही थी। आखिरी सवाल में छह अंकों की संख्या पूछी गई।

बालमुनि ने दिए सभी प्रश्नों के सही उत्तर
करीब 3 घंटे तक चले प्रश्नों के सिलसिले के बाद मुनिश्री बाल शतावधानी श्री पद्मप्रभचन्द्रसागरजी ने एक एक कर २०० प्रश्नों केशत प्रतिशत सही उत्तर दिए। उत्तर देते समय कहीं-कहीं मुनिश्री मात्र कुछ सेकेंड के लिए रुके। उनके द्वारा फटाफट दिए जा रहे उत्तर सुनकर कोई भी सहज ही अपने कानों पर विश्वास नहीं कर पा रहा था परन्तु आंखों देखी घटना को देखने पर सबको इस स्मरण शक्ति के चमत्कार को मानना ही पड़ा। यही नहीं, मुनिश्री ने इन 200 प्रश्नों के उल्टे क्रम में भी उत्तर दिए। उनके गुरु मुनिश्री अजीतचंद्रसागरजी म.सा यहां पर भी नहीं रुके उन्होंने अपने बालमुनि शिष्य की ओर परीक्षा लेने के लिए लोगों से अनियमित क्रम में प्रश्नों के उत्तर पूछने को कहा जिसे भी बाल मुनिश्री ने सही सही बता दिया। मुनिश्री द्वारा इस प्रस्तुति से उपस्थित जन आश्चर्यचकित रहे बिना नहीं रह सके। सभी के मन में अनेक प्रश्न उठ रहे थे परन्तु आंखों देखी पर आखिरकार बालमुनि की स्मरण शक्ति व एकाग्रता का लोहा मानना ही प़डा। 200 प्रश्नों के सही सही उत्तर देने के साथ बाल शतावधानी श्री पद्मप्रभचन्द्रसागरजी मुनि बन गए महाशतावधानी। कार्यक्रम के बीच बीच में अजीतचन्द्रसागरजी ने बताया कि मां सरस्वती की साधना, एकाग्रता, याददाश्त, आईक्यू लेवल व आत्मसिद्धि से ही यह महाशतावधान संभव हो पाता है।

प्रशासनिक अधिकारी, वैज्ञानिक व आमजन शामिल
श्री सरस्वती साधना रिसर्च फांउडेशन के टीम ने महाशतावधान में प्रश्न पूछने की व्यवस्था संभाली। इस कार्यक्रम में पुलिस महानिदेशक एनएस मेघरिक, कर्नाटक लेंड बैंक विकास कॉर्पोरेशन के मनोज जैन, प्रशासनीक अधिकारी बीएफ पाटिल, आईआरएस, शैलेन्द्र कुमार, इसरो के वैज्ञानिक एनके श्रीवास्तव, आईटीसी के वैज्ञानिक डॉ आदित्य, विंग कमांडर आरके मंडल, निम्हांस के प्रोफेसर डॉ जगदीश, प्रोफेसर परमिता, प्रोफेसर ऊषा रानी, कर्नाटक वाटर सप्लाई बोर्ड के पूर्व प्रबंध निदेशक श्रीनिवास रेड्डी, सेवा निवृत डीसीपी ईश्वर प्रसाद, ईटीवी कन्ऩड के पूर्व कार्यक्रम निदेशक रमेश आदि सहित बेंगलूरु के विभिन्न सभा संस्थाओं के पदाधिकारी व प्रतिनिधि उपस्थित थे।

maha shatavdhan bu balmuni ji
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आचार्यश्री ने बालमुनि को गले लगाकर दिया आशीर्वाद
कार्यक्रम के अंत में महाशतावधानी के गुुरु आचार्यश्री नयचंद्र सागरसूरीश्वरजी आए और अपने शिष्य को गले लगाकर आशीर्वाद दिया। लोगों ने बालमुनि को कंधे पर उठाकर उनकी जयजयकार की। पूरे सभागार में मुनिश्री की स्मरण शक्ति की ही चर्चा थी। कार्यक्रम के अंत में अक्कीपेट संघ के मंत्री कांतिलाल मुथा ने सभी का आभार जताया। महाशतावधान आयोजन समिति के चेयरमैन पारस भंडारी के नेतृत्व में प्रचार प्रसार की जिम्मेदारी सज्जनराज मेहता और कैलाश संकलेचा, धार्मिक स्थलों पर प्रचार प्रसार हेतु गौतम सोलंकी, भोजन समिति में महेंद्र रांका और जीवराज जैन, सेवा कार्यकर्ता समिति में दिनेश हक्कानी, गौतम जैन, ललित जैन ने संभाली। शहर के विभिन्न मंडलों ने महाशतावधान कार्यक्रम की विभिन्न व्यवस्थाएं संभाली।

इनका कहना है
यह प्रस्तुति वास्तव में दिमाग के उत्कृष्ट प्रदर्शनों में से एक है। स्मरण शक्ति व उच्च आईक्यू का परिणाम है। बालमुनि जैसे व्यक्ति विरले ही होते हैं जो साधना व अभ्यास द्वारा अपने ब्रेन की क्षमता को ब़ढा लेेते हैं तथा ब्रेन के माड्यूल को अपनी उपयोगिता के हिसाब से ढाल भी लेते हैं। इसके लिए बहुत अभ्यास करना जरुरी है। यह एक बुद्धिजीविता की पराकाष्ठा है।
– डॉ. प्रमोदकुमार पाल, प्रोफेसर व एचओडी, न्यूरोलॉजी, निम्हांस

स्मरण शक्ति व एकाग्रता का यह प्रयोग हमारे अक्कीपेट संघ के तत्वावधान में हुआ जो कि हमारे लिए गौरव का विषय है। दक्षिण भारत का पहला शतावधान महोत्सव का आयोजन बहुत ही सफल रहा और सभी का बहुत ही सकारात्मक सहयोग प्राप्त हुआ। मुनिश्री एक महान साधक व तपस्वी हैं। ऐसे ज्ञानी, ध्यानी व योगी संतों का चातुर्मास अक्कीपेट को मिला जो कि अपने आप में गर्व का विषय है। हम सभी सहयोगियों के प्रति कृतज्ञ है।
– अक्कीपेट संघ के अध्यक्ष उत्तमकरण मेहता व मंत्री कांतिलाल मूथा

आज मेरे सांसारिक बेटे ने एक बार फिर मेरा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। मैं ऐसा सुपात्र पुत्र पाकर व जिनशासन को समर्पित कर अपने आप को धन्य मानता हूं। बचपन से ही बालमुनि बहुत ही प्रतिभाशाली रहे। उनके जन्म से ही मेरे जीवन की सभी परेशानी दूर हो गई। आज इतने ब़डे आयोजन में मेरे सांसारिक बेटे की प्रतिभा को देखकर मेरा सीना गर्व से चौ़डा हो गया है। उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना।
– प्रफ्फुलभाई शाह, बालमुनि के सांसारिक पिता

तप और साधना की शक्ति का अनूठा उदाहरण है बाल महाशतावधानी श्री पद्मप्रभ चन्द्रसागरजी। इस प्रकार की विलक्षण क्रियाएं हमारी भारतीय संस्कृति में हैं और यह आयोजन उसी विलुप्त होती क्रिया का एक जीवंत उदाहरण है। ध्यान, योग, अभ्यास व एकाग्रता से इस प्रकार के प्रयोग किया जा सकते हैं । आज का आयोजन बेहतरीन व अद्भुत रहा।
– एनएस मेघरिक, आईपीएस, अतिरिक्त डीजीपी व पूर्व पुलिस आयुक्त

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