भेदभाव का श्राप

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एक लंबे अर्से से सामाजिक न्याय, भेदभाव और लैंगिक आधार पर उत्पी़डन रोकने के लिए अच्छी मंशा से बनाए गए कानूनों के दुरुपयोग के मामले प्रकाश में आते रहे हैं। दहेज उत्पी़डन रोकथाम कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए शीर्ष अदालत की पहल का स्वागत ही हुआ था। अब मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून का दुरुपयोग रोकने की दिशा में वक्त की जरूरत के हिसाब से कदम ब़ढाया है। ऐसे तमाम मामले प्रकाश में आए कि दूसरे मामलों के विवाद में इस कानून को हथियार बनाया गया। यह मामला महाराष्ट्र का था, जहां एक अधिकारी द्वारा मातहत कर्मचारी की गोपनीय रिपोर्ट पर नकारात्मक टिप्पणी दर्ज करने पर इसे जातीय उत्पी़डन का मामला बनाया गया। शीर्ष अदालत का कहना था कि संसद ने जब यह कानून बनाया था तो इसका मकसद सामाजिक न्याय था न कि भयादोहन व दुरुपयोग करना। नि:संदेह सदियों से चले आ रहे अन्याय व भेदभाव का खात्मा होना चाहिए मगर यदि कानून का गलत इरादे से उपयोग हो तो यह अस्वीकार्य है। ऐसी शिकायत के मामलों में एक सप्ताह के भीतर शुरुआती जांच हो जाए, डीएसपी स्तर का अधिकारी मामले की जांच करे। यदि मामले में प्राथमिकी दर्ज भी कर ली गई हो तो भी जरूरी नहीं है कि गिरफ्तारी की ही जाए। अगर अभियुक्त सरकारी कर्मचारी है तो उसकी गिरफ्तारी के लिए सक्षम अधिकारी की अनुमति ली जाए। यदि नहीं तो एसएसपी की सहमति जरूरी है। वैसे तो एक्ट के सेक्शन १८ में अग्रिम जमानत की मनाही है, मगर अदालत का मानना था कि समीक्षा के बाद यदि लगता है कि शिकायत बदनीयती की भावना से की गई है, तो वहां अग्रिम जमानत पर पूरी रोक नहीं है। अदालत ने माना कि एससी-एसटी कानून का मकसद कतई यह नहीं है कि समाज में जाति व्यवस्था जारी रहे। संविधान बिना किसी जातीय भेदभाव के बराबरी की बात करता है। अदालत ने एनसीआरबी के आंक़डों का जिक्र किया जिसमें सोलह फीसदी मामलों में पुलिस जांच के बाद अंतरिम रिपोर्ट लगा दी गई। इसी तरह अदालत गये ७५ फीसदी मामले या तो खत्म हो गये, अभियुक्त बरी हो गये अन्यथा उन्हें वापस ले लिया गया। मगर इस कानून का दुरुपयोग रोकने की दिशा में कदम ब़ढाने के साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि वंचित समाज को न्याय मिलने में कोई बाधा उत्पन्न न हो। वे लोग जो सामाजिक संकीर्णताओं और भेदभाव के बीच जी रहे हैं, उन्हें अपने संवैधानिक व कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाए।

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