कुदरत दे रही संकेत, नहीं चेते तो डूब जाएगी मायानगरी मुंबई!

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mumbai rain
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मुंबई. अक्सर मानसून की शुरुआत खुशनुमा तस्वीरों से होती है लेकिन बहुत जल्द हालात बदल जाते हैं। राहत की बूंदें आफत की बारिश में तब्दील जाती हैं। इसके लिए मौसम से ज्यादा जिम्मेदार लापरवाह ढंग से किया गया इंतजाम है। इन दिनों कुछ ऐसा ही मुंबई में हो रहा है।

भारी बारिश के चलते सड़कें लबालब हो गई हैं। इससे पहले 21 जून को बृहन्मुंबई म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन (बीएमसी) ने बॉम्बे हाई कोर्ट को आश्वस्त किया था कि वह इस मानसून में सभी प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए तैयार है। उसने 186 ऐसे स्थानों को चिह्नित कर लिया जहां बाढ़ का खतरा ज्यादा है। सा​थ ही पानी निकालने के लिए पंप और मैनहॉल की सुरक्षा के भी पुख्ता बंदोबस्त कर लिए। मगर ये सभी बंदोबस्त सिर्फ कागजी साबित हुए। बारिश ने पूरे इंतजाम की पोल खोल दी।

मंगलवार को मुंबई में औसत वार्षिक वर्षा से 65 प्रतिशत ज्यादा पानी सिर्फ एक महीने में ही आ गया। महानगर के हिंदमाता, गोरेगांव, चेम्बुर और मानखुर्द जैसे इलाकों में पानी भर गया है। वसाई में एनडीआरएफ की टीम तैनात की जाएगी। लोकल ट्रेनों के पहिए थम गए हैं और हवाई उड़ान बाधित हो रही हैं।

कुल मिलाकर ये तस्वीरें जाहिर करती हैं कि मायानगरी व देश की आर्थिक राजधानी मुंबई अव्यवस्थित शहरी योजना और मौसम के बदलते स्वरूप के तले डूब रही है। शहर में कंक्रीट के बढ़ते जंगल को विकास के साथ जोड़कर देखा जा रहा है लेकिन कई विशेषज्ञों का मानना है कि ये प्रोजेक्ट मुंबई के बरसाती पानी निकालने की क्षमता को कम कर रहे हैं।

इस समस्या के संदर्भ में विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार कंक्रीट निर्माण की वजह से हर साल समस्या बढ़ रही है। ज्यादा निर्माण का मतलब है, सतही क्षेत्र का लगातार कम होना। नए प्रोजेक्ट्स की वजह से पानी की निकासी के लिए कई खुले इलाके कम होते जा रहे हैं। अगर ऐसा जारी रहा तो निश्चित रूप से भविष्य में स्थिति बहुत चुनौतीपूर्ण होगी और मुंबई को इसका सामना करना पड़ेगा।

आईआईटी के अध्ययन भी खतरे की घंटी बजा चुके हैं। आईआईटी मुंबई और गांधीनगर के अध्ययन से निकलकर आए नतीजे बता रहे हैं कि मुंबई की फिक्र नहीं की तो एक दिन यह जलसमाधि ले लगी। अध्ययन में सुझाव दिया गया था कि शहर को ​पानी की निकासी के लिए अपनी क्षमता बढ़ानी होगी। बीते कुछ दशकों में यहां आबादी का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। उसके विपरीत पानी निकासी का इंतजाम पुराने रिकॉर्ड पर ही आधारित है।

मौसम संबंधी आंकड़े भी इसी ओर इशारा कर रहे हैं। वे बताते हैं कि निकट भविष्य में मुंबई को गंभीर बाढ़ जैसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। पुणे में इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ ट्रॉपिकल मीटिरियोलॉजी ने एक अध्ययन में पाया कि पूरे भारत में मानसून के दौरान पिछले तीन वर्षों में बारिश की चरम सीमा में तीन गुना वृद्धि हुई है। इसी प्रकार आईआईटी मुंबई ने कोलाबा (1901-2008) और सांताक्रूज (1951-2008) के बरसात संबंधी आंकड़ों का अध्ययन किया और पाया कि इस बात की एक प्रतिशत संभावना है कि कोलाबा में सिर्फ एक घंटे में ही 164 मिमी बारिश हो जाए। 26 जुलाई, 2005 को मुंबई में प्रतिघंटे 190 मिमी बारिश दर्ज की गई, जो एक भयावह परिदृश्य की ओर संकेत कर रही है।

मौसमी से अलग, धरातल पर हमारी तैयारियां कितनी हैं, इस पर लगातार बहस होती रही है। अक्सर देखने में आता है कि जिन सरकारी संस्थानों पर योजनाबद्ध ढंग से काम कर हालात बेहतर बनाने की जिम्मेदारी होती है, वे एक दूसरे से तालमेल कायम कर काम नहीं कर पाते। हर कहीं लापरवाही बरती जाती है।

मिसाल के तौर पर, अगर एक विभाग नालों की सफाई, खुदाई जैसे काम करता है और दूसरा भवन निर्माण के प्रोजेक्ट्स की निगरानी करता है, तो दोनों में तालमेल की कमी से समस्याएं पैदा होंगी। ये समस्याएं मानसून के दौरान और ज्यादा विकराल रूप में सामने आएंगी, क्योंकि बंद नालों का पानी सड़कों पर आ जाता है। यह लोगों के घरों में प्रवेश कर जाता है। नींव में पानी रिसने से हर साल कई मकान गिर जाते हैं और लोगों को जान गंवानी पड़ती है। कचरे के निस्तारण के भी माकूल इंतजाम नहीं हैं, जिससे ऐसा हर साल होता है।

बेतरतीब निर्माण कार्य, बदलती मौसमी दशाओं और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के आधे-अधूरे प्रयासों की वजह से मुंबई हर साल मानसून में बाढ़ जैसी स्थिति का सामना कर रही है। अगर हम अब नहीं चेते तो ऐसा हर बरसात में होगा और भविष्य में यह मायानगरी पानी में समा जाएगी।

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