light and dark
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(अपनी बात)

— श्रीकांत पाराशर, समूह संपादक —

एक छोटी-सी घटना से अपनी बात प्रारंभ करना चाहूंगा। बताया जाता है कि हमारे देश के उत्तर-पूर्व में किसी दूर दराज के क्षेत्र में एक गांव है। वहां यह रिवाज सदियों से चला आ रहा है कि जब भी किसी आदमी की मृत्यु होती है तो मृतक के शव को गांव के चौक पर बीच में रख दिया जाता है और पूरे गांव के लोग उसके चारों तरफ वहां एकत्र हो जाते हैं। एक शोक सभा का सा रूप होता है इस बैठक का। रिवाज है कि इस बैठक में मृतक की प्रशंसा में कुछ कहा जाता है और उसके बाद ही मुर्दे को जलाने के लिए श्मशानघाट ले जाया जाता है। प्रशंसा भी झूठी नहीं की जा सकती। उसके स्वभाव से मेल खानी चाहिए। प्रशंसा के शब्दों में सच्चाई हो। दूसरी बात, मृतक की प्रशंसा ही करनी होती है, बुराई नहीं की जा सकती।

उस गांव में एक आदमी मरा। वह इतना बुरा था कि उसकी प्रशंसा में दो शब्द भी कहना कठिन था। जिंदगी भर उसने लोगों को परेशान किया। कभी किसी की भलाई के बारे में नहीं सोचा। लोगों ने खूब सिर पचाया कि उसका कोई एक-आध गुण याद आ जाए तो सराहना में कह दें परन्तु शब्द नहीं मिले। समस्या थी कि रिवाज पूरा नहीं हो तब तक मुर्दे को जलाएं भी कैसे? परम्परा थी कि उसके गुणों का बखान किया जाए। समस्या यह थी कि मृतक में कुछ गुण रहे हों तो कोई बखान भी करे। सुबह से शाम होने को आई परन्तु मृतक के लिए कोई प्रशंसा योग्य बात किसी के ध्यान में नहीं आई।

इतने में एक आदमी खड़ा हुआ। लोगों को आश्‍चर्य हुआ कि कौन सी अच्छी बात कहेगा वह। परन्तु उस चतुर व्यक्ति ने आखिर प्रशंसा की बात कह ही दी। उसने कहा, ‘ये सज्जन जो चल बसे, इनके तीन भाई और हैं, उन तीनों की तुलना में ये देवतातुल्य व्यक्ति थे।’ इतना कहते ही उनका रिवाज पूरा हो गया और उस आदमी की बात भी रह गई, क्योंकि उसे झूठ भी नहीं बोलना था। दरअसल बात यह थी कि मृतक के जो तीन भाई थे, वे उससे (मृतक से ) भी ज्यादा अव्वल दर्जे के धूर्त, मक्कार और दूसरों को पीड़ा देने वाले थे। इसलिए उसने उन तीनों भाइयों की तुलना में मृतक को देवतातुल्य बता दिया। इससे मृतक की प्रशंसा भी हो गई और रिवाज की भी इज्जत बच गई। व्यक्ति ने इस ढंग से जो कुछ बोला, वह सच भी था क्योंकि झूठ होने पर भी रिवाज टूट जाता।

एक जमाना था जब लोग लोक-लाज की परवाह करते थे। ऐसा सोचते थे कि मैंने यदि किसी का भला नहीं किया तो मरने के बाद मेरे बारे में लोग क्या कहेंगे, दूसरों का दिल दुखाया तो कितनी बदनामी होगी। इस डर से भी लोग किसी का बुरा नहीं करते थे। अगर लोग किसी के भले की नहीं सोचते तो भी कम से कम किसी का बुरा करने का खयाल तो कतई मन में नहीं लाते थे। आजकल तो लोग मरने के बाद की चिंता तो दूर, अपने सामने ही बदनामी की चिंता नहीं करते। लोग कहते हैं, मरने के बाद कोई गालियां दे तो क्या फर्क पड़ता है? ऐसे लोग जीवन भर दूसरों के रास्तों में कांटे बोते रहते हैं, दूसरों को बदनाम करने के हथकन्डे ढूंढते रहते हैं, अपने स्वार्थ के लिए किसी के भी तलवे चाटने को तैयार रहते हैं, अपने जमीर को खूंटी पर टांग देते हैं और किसी को भी पीड़ा पहुंचाकर यह महसूस करते हैं कि उन्होंने कोई बहुत बड़ी बाजी मार ली। पूरा दिन केवल दूसरों के लिए गड्ढा खोदने में ही बिता देते हैं।

बुद्धिमान लोग कहते हैं कि ऐसे लोगों को समझाने-बुझाने से कोई फायदा नहीं होता क्योंकि यदि उनमें समझ ही होती तो ऐसा करते ही क्यों? ऐसे लोगों के पाप कर्म का घड़ा जब भरता है और उसके संकेत जब वह अदृश्य शक्ति, जिसे ईश्‍वर कहा जाता है, कष्टों के रूप में देती है, तब वे मंदिरों, मस्जिदों और चर्चों में माथा टेकते फिरते हैं। ऐसे लोग नौकरी के लिए, संतान के लिए, पदोन्नति के लिए, बुढ़ापा सुरक्षित रहे इसके लिए दर-दर की ठोकरें खाते हैं। प्रभु को दया आती है तो कभी कभी ऐसे लोगों पर भी कृपा कर देता है परन्तु कष्ट दूर होने के बाद वे यह बात फिर भूल जाते हैं और फिर से शैतानियों का सफर शुरू कर देते हैं।

पुराने समय में लोग इस बात से ज्यादा चिंतित रहते थे कि उनसे अनजाने में भी कुछ ऐसा-वैसा नहीं हो जाए कि लोग उन्हें बुरा बताएं। लोकलाज या बड़े-बुजुर्गों का लिहाज तथा ऐसे ही अन्य कई कारणों से व्यक्ति अपने जीवन की रेल को पटरी पर ही चलने देने के लिए प्रयत्नरत रहता था। अब तो लोगों की दृष्टि ही बदल रही है। आज के व्यक्ति की सोच बदल रही है। मरने के बाद कोई दो अच्छे शब्द कहे या न कहे, कोई मायने नहीं रखता। दरअसल आजकल लोग स्वयं के दुखों से उतने दुखी नहीं हैं जितने दूसरों के सुखों की ईर्ष्या से दुखी हैं और मात्र यही कारण है कि दूसरों को कष्ट देना उनकी फितरत में शामिल हो गया है।

आज हम देखते हैं कि दिखावे के लिए तो व्यक्ति मंदिरों में जाता है, भजन-जागरण के कार्यक्रमों में भी हिस्सा लेता है परन्तु अपनी सोच में बदलाव नहीं लाता। सोच वैसी की वैसी। खुद को कोई लाभ हो या न हो, दूसरों को कष्ट पहुंचा सके तो कलेजे को ठंडक मिलती है। ऐसे लोग, जो जीते जी किसी के कोई काम नहीं आते, किसी का कोई भला नहीं कर सकते उनके अलविदा कह देने के बाद उनकी प्रशंसा में दो शब्द बोलने के लिए भी लोग तरस जाते हैं।

यदि हम कोई बड़े धर्मात्मा नहीं बन सकते तो न सही, परन्तु जीवन में कुछ न कुछ भलाई का काम करें, जिससे हमें कम से कम आत्म संतुष्टि मिले, इतना तो सोचना जरूरी है। हमारी सुबह ही प्रपंचों से शुरू हो तथा पूरा दिन लोगों को दुख देने के प्रयासों में ही बीते और रात होते-होते हम खुराफात करने का अंबार लगा लें, तो यह अमूल्य जीवन निश्‍चय ही हम बरबाद कर रहे हैं। यह कोई दार्शनिकता भरा वक्तव्य नहीं बल्कि जीवन की सच्चाई है। मनुष्य को ऐसे काम नहीं करने चाहिएं कि लोग यह कहने को बाध्य हो जाएं कि इस व्यक्ति में ‘भलाई तो ढूंढते रह जाओगे।’

2 COMMENTS

  1. नमस्ते। आप की अपनी बात और मोदी जी की मन की बात दोनों में राष्ट्रमत है। आप अपनी लेखनी से समाज के विभिन्न कुरीतियों को सुधारने का प्रयास कर रहे हैं। यह एक संपादक, लेखक, एवं सामाजिक कार्यकर्ता के साथ साथ साहित्यकार के लिए भी प्रतिष्ठा की बात है। इस तरह के सामाजिक सरोकार के लिए धन्यवाद।

  2. Bhai Shrikantji,,, namaskar,,
    Aapki nirbhik patrakarita ke liye apko badhai,
    Mai to shuruaat se hi apko pasand karta tha magar aajkal to mai apka Ashik ho gaya hu,
    Doctors ki padvi ke baare me apka lekh padhkar mai apka kayal ho gaya .
    Apki kalam issi tarah apko aur unche shikhar par le jaye ,,,yehi kamna prabhu se
    Kushal bachhawat
    Bangalore

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