बेंगलूरु/दक्षिण भारतशांतिनगर जैन श्वेताम्बर संघ में आचार्यश्री महेन्द्रसागरसूरीश्वरजी ने अपने प्रचवन में कहा कि अमूल्य जीवन को जीव आरम्भ परिग्रह विषय मोह आदि के सेवन में व्यर्थ कर रहा है। तीर्थंकर अरिहंत प्रभु की आत्मा तीर्थंकर होने से तीसरे भव में इतनी करुणा और दया से भरी होती है कि जिसका कोई नाप नहीं हो सकता, इसी कारण से केवल इस लोक के ही जीव नहीं अपितु त्रिभुवन छोटे ब़डे सभी जीव उन्हें दिल से चाहते है। वे जैसे है जैसे सुखी है वैसे सब जीवों को परम सुखी बना देना चाहते हैं इसलिए हर कोई उन्हें दिल से प्यार करने लगता है। वे सभी जीवों को संसार के बंधनों एवं माया जाल से छु़डा कर अपने समान ही बना देना चाहते है। अतः वे स्वयं वे स्वयं समस्त जीवों के कल्याण हेतु त्याग मार्ग प्रमुख होकर साधना पथ में कदम रखते हैं जिससे स्वकल्याण के साथ सर्व का कल्याण कर सके। इसीलिए उनका कोई बुरा नहीं चाहता और कोई दुश्मन नहीं होता। रास्तों से भटक जाने वाला पथिक, सही रास्ता दिखाने वाले को हमेशा याद रखता है। उसके उपकार को विस्मृत नहीं करता है।सामान्य रास्ता दिखाने वाला और भला चाहने वाला भी उपकारी होता है, तो भव वन में भटकने वाले जीवों को मोक्ष मार्ग बताकर मोक्ष में अपने साथ ले जाने वाले उस तीर्थंकर प्रभु के तीर्थंकर बनने से पहले के उपकारों का वर्णन करना भी असंभव है। विश्व संचालन में सूर्य का जितना महत्वपूर्ण स्थान और योगदान है, उससे भी अनंत गुणा महत्वपूर्ण स्थान और योगदान तीर्थकर अरिहंत परमात्मा का है, क्योंकि वे इस जगत पर तीन-तीन भव से जो उपकार करते है वैसा उपकार कोई भी नहीं करता है। आचार्यश्री ने कहा कि जीवों में जो भी अच्छाई दिखाई दे रही है वो सब उनके प्रभाव से है। यदि वे न होते और जीवों पर कुरणा न बरसाई होती, जगत के जीवों को हित का मार्ग नहीं बताया होता, फिर शासन की स्थापन करके इस संसार में शासन प्रभावना न की होती, तो दया नम्रता, संतोष सरलता, करुणा आदि जो जगत में देखने को मिलते है वे देखने कभी नहीं मिलते। इस तरह इस जगत पर सबसे ज्यादा करुणा और उपकार श्री तीर्थंकर अरिहंत का है। अरिहंत इसी कारण से पुण्य प्रतापी और पूजनीय होते है क्योंकि दूसरे जीवों को सुखी करने की भावना और प्रयास उनका आनन्द होता है।

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