पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन के न झुकने से राम रहीम पहुंचा जेल

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बेंगलूरु। सीबीआई को सरकार का तोता कहा जाता है लेकिन अगर इस तोते को बिना किसी दबाव में काम करने दिया जाए तो यह बाज की भांति अपने शिकार को जकड़ लेता है। बलात्कार मामलों में दोषी करार दिया गया डेरा सच्चा सौदा का प्रमुख गुरमीत राम रहीम को सजा दिलाने में सीबीआई ने उसी बाज की भूमिका अदा की और इसमें पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह की भूमिका भी सराहनीय रही जिन्होंने तमाम राजनीतिक दबावों को दरकिनार करते हुए सीबीआई को इस मामले की जांच करने की खुली आजादी दी थी।

राम रहीम के खिलाफ बलात्कार मामले की जांच कर रहे सीबीआई के मुख्य अधिकारी ने इस मामले में बड़ा खुलासा करते हुए कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राम रहीम के मामले में जांच अधिकारियों को पूरी छूट दी थी और मनमोहन सिंह उस समय तमाम किस्म के दबावों के आगे नहीं झुके। मामले के मुख्य जांचकर्ता और सीबीआई के रिटायर्ड डीआईजी एम नाराणन ने बताया कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हमेशा सीबीआई का साथ दिया और उन्होंने हमें कानून के अनुसार आगे बढ़ने का निर्देश दिया। न्यूज18 से बात करते हुए नारायणन ने यह खुलासा किया।

चैनल न्यूज-18 के डीपी सतीश की स्टोरी के अनुसार बकौल नारायणन, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सीबीआई को फ्री हैंड दिया था। वे पूरी तरह जांच एजेंसी के साथ थे। उनके हमें स्पष्ट निर्देश थे कि हम कानून के अनुसार चलें। उन्होंने दोनों साध्वियों के लिखित बयान पढ़ने के बाद कहा कि पंजाब और हरियाणा के सांसदों के दबाव में आने की कोई जरूरत नहीं। नारायणन ने यह भी कहा कि दोनों राज्यों के सांसदों से इतना ज्यादा दबाव था कि मनमोहन सिंह ने तब के सीबीआई चीफ विजय शंकर को बुलाया और पूरे मामले की जानकारी ली। उसके बाद से सीबीआई ने अपना काम बिना किसी दबाव के किया। नारायणन ने विजय शंकर की सराहना करते हुए कहा कि दोनों राज्यों के पावरफुल सांसदों ने उस समय विजय शंकर से स्पष्ट रूप से कहा था कि वे राम रहीम पर चल रही जांच को वापस ले लें लेकिन विजय शंकर पीछे नहीं हटे और उन्होंने सीबीआई जांच टीम को पूरा समर्थन किया।

जिस दिन राम रहीम को 20 साल की सजा हुई उस दिन केरल के कासरगुड मूल के नारायणन मैसूर में थे। कोर्ट के आदेश के बाद उन्होंने इस फैसले से संतोष जताया और कहा कि राम रहीम अन्य मामलों में भी दोषी सिद्ध होगा, वह दो लोगों की हत्या के मामले में भी आरोपी है। डेरा चीफ के मामले में जांच के बारे में बात करते हुए नारायणन ने बताया कि यह शिकायत 2002 में दर्ज की गई थी, लेकिन 2007 तक इस मामले में कुछ नहीं हुआ था। इस मामले को कोर्ट में पहुंचने के बाद पंजाब और हरियाणा कोर्ट ने इसकी गंभीरता को देखते हुए इस मामले की जांच सीबीआई से कराने का आदेश दिया था। कोर्ट ने सीबीआई चीफ विजय शंकर को इस मामले में सफाई देने के लिए भी समन किया था जिसके बाद कोर्ट ने हमें साध्वी का पत्र दिया था और पत्रकार रामचंद्र छत्रपति व डेरा के कार्यकर्ता रंजीत सिंह की हत्या के मामले की फाइल सौंपी थी। कोर्ट ने निर्देश दिया था कि इस मामले की जांच को 57 दिन के भीतर पूरा किया जाए्।

नारायणन ने बताया कि हमारे पास जो सबसे बड़ी चुनौती थी वह यह कि जो पत्र साध्वी की ओर से लिखा गया था, वह अज्ञात थी, इसमें यह नहीं बताया गया था कि इस पत्र को किसने लिखा है? बाद में हमें इस बात की जानकारी मिली कि 1999-2002 तक 200 साध्वियों ने यौन शोषण की वजह से डेरा छोड़ दिया था जिसके बाद आखिरकार हम 10 महिलाओं को ढूंढ सके जिनका यौन शोषण हुआ था लेकिन ये सभी विवाहिता महिलाएं थीं और किसी भी तरह का बयान देने के लिए तैयार नहीं थीं। बाद में हम सिर्फ दो महिलाओं को बयान देने के लिए राजी कर सके और उसके आधार पर हमने 56 दिन के भीतर अंबाला कोर्ट में चार्जशीट दायर की।

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  1. अति सटीक एवं समयोचित समाचार प्रेषित करने के लिए धन्यवाद!

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